Transliteration: (Fasfah 'anhum wa qul salaam; fasawfa ya'lamoon (section 7))
"तो आप उनसे दरगुज़र फ़रमाइए [154] और कह दीजिए: 'सलाम है' [155]! पस अनक़रीब वे जान लेंगे।"
दरगुज़र फ़रमाने का मतलब यह है कि उनके इन्कार पर रंजीदा न हों। इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि तब्लीग़ रोक दी जाए—बल्कि दीन की दावत क़यामत तक जारी रहेगी। यह दिल को तसल्ली देने का हुक्म है।
यहाँ 'सलाम' मोहब्बत वाला सलाम नहीं, बल्कि बेज़ारी और किनारा-कशी का सलाम है (जैसे किसी से पीछा छुड़ाने के लिए दूर से सलाम कह दिया जाए)।
सलाम के मुख़्तलिफ़ मफ़हूम हैं:
काफ़िरों के लिए: यह किनारा-कशी और बेज़ारी का इज़हार है जैसा कि इस आयत में है।
नमाज़ के तशह्हुद में: यह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बारगाह में आजिज़ाना सलाम और दुआ है।
मोमिनीन के दरमियान: यह मोहब्बत, सलामती और भाईचारे की दुआ है।
अल्लाह की तरफ़ से नबियों पर सलाम: यह अज़ीम शरफ़ व इज़्ज़त का इज़हार है, जैसे फ़रमाया: "सलाम हो रसूलों पर" (सूरह अस्-साफ़्फ़ात 37:181)।
पस, हठधर्म काफ़िरों से किनारा-कशी इख़्तियार करना ज़रूरी है, और वे अनक़रीब अपने कुफ़्र का अंजाम देख लेंगे।
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