कुरान - 43:89 सूरह अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

89
فَٱصۡفَحۡ عَنۡهُمۡ وَقُلۡ سَلَٰمٞۚ فَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Fasfah 'anhum wa qul salaam; fasawfa ya'lamoon (section 7))

तो आप उनसे दरगुज़र फ़रमाइए [154] और कह दीजिए: 'सलाम है' [155]! पस अनक़रीब वे जान लेंगे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुखरुफ आयत 89 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ज़ुख़रुफ़ तफ़सीर - आयत 89

"तो आप उनसे दरगुज़र फ़रमाइए [154] और कह दीजिए: 'सलाम है' [155]! पस अनक़रीब वे जान लेंगे।"

[154] दरगुज़र फ़रमाना और तब्लीग़ जारी रखना

दरगुज़र फ़रमाने का मतलब यह है कि उनके इन्कार पर रंजीदा न हों। इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि तब्लीग़ रोक दी जाए—बल्कि दीन की दावत क़यामत तक जारी रहेगी। यह दिल को तसल्ली देने का हुक्म है।

[155] यहाँ 'सलाम' का मफ़हूम और सलाम की क़िस्में

यहाँ 'सलाम' मोहब्बत वाला सलाम नहीं, बल्कि बेज़ारी और किनारा-कशी का सलाम है (जैसे किसी से पीछा छुड़ाने के लिए दूर से सलाम कह दिया जाए)।

सलाम के मुख़्तलिफ़ मफ़हूम हैं:

  • काफ़िरों के लिए: यह किनारा-कशी और बेज़ारी का इज़हार है जैसा कि इस आयत में है।

  • नमाज़ के तशह्हुद में: यह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बारगाह में आजिज़ाना सलाम और दुआ है।

  • मोमिनीन के दरमियान: यह मोहब्बत, सलामती और भाईचारे की दुआ है।

  • अल्लाह की तरफ़ से नबियों पर सलाम: यह अज़ीम शरफ़ व इज़्ज़त का इज़हार है, जैसे फ़रमाया: "सलाम हो रसूलों पर" (सूरह अस्-साफ़्फ़ात 37:181)।

पस, हठधर्म काफ़िरों से किनारा-कशी इख़्तियार करना ज़रूरी है, और वे अनक़रीब अपने कुफ़्र का अंजाम देख लेंगे।

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