कुरान - 39:35 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

35
لِيُكَفِّرَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ أَسۡوَأَ ٱلَّذِي عَمِلُواْ وَيَجۡزِيَهُمۡ أَجۡرَهُم بِأَحۡسَنِ ٱلَّذِي كَانُواْ يَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Liyukaffiral laahu 'anhum aswa allazee 'amiloo wa yajziyahum ajrahum bi ahsanil lazee kaano ya'maloon)

ताकि अल्लाह उनसे उनकी बुराइयों को दूर फ़रमा दे जो उन्होंने कीं [86] [87], और उन्हें उनके बेहतरीन आमाल का सिला अता फ़रमाए [88] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 35 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 35

"ताकि अल्लाह उनसे उनकी बुराइयों को दूर फ़रमा दे जो उन्होंने कीं [86] [87], और उन्हें उनके बेहतरीन आमाल का सिला अता फ़रमाए [88] ।"

[86] ख़ताओं की मुआफ़ी और पर्दापोशी

सच्चे ईमान और इख़्लास की बरकत से अल्लाह तआला इंसान की पिछली तमाम लग़्ज़िशों और कोताहियों को मिटा देता है और अपने फ़ज़्ल से उनकी सज़ा से महफ़ूज़ फ़रमा देता है।

[87] ज़माना-ए-जाहिलियत की बातों से दरगुज़र

अगर इस्लाम लाने से पहले ज़माना-ए-जाहिलियत में कोई बात हुई हो, तो इस्लाम लाने से वह सब माफ़ हो जाती है। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने तो ज़माना-ए-जाहिलियत में भी कभी बुतपरस्ती या शराबनोशी नहीं की थी, मगर अल्लाह का करम ऐसा वसीअ है कि मुक़र्रबीन के दर्जात को हर शाइबे से पाक फ़रमा देता है।

[88] बेहतरीन आमाल की बिना पर अज़ीम अज्र

अल्लाह करीम का दस्तूर-ए-रहमत है कि वह बंदों के नेक आमाल में से सबसे आला और अफ़ज़ल अमल के मुताबिक़ अज्र अता फ़रमाता है, जिससे छोटे नेक आमाल की क़ीमत भी बुलंदतरीन दर्जे तक पहुँच जाती है।

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