कुरान - 35:18 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٞ وِزۡرَ أُخۡرَىٰۚ وَإِن تَدۡعُ مُثۡقَلَةٌ إِلَىٰ حِمۡلِهَا لَا يُحۡمَلۡ مِنۡهُ شَيۡءٞ وَلَوۡ كَانَ ذَا قُرۡبَىٰٓۗ إِنَّمَا تُنذِرُ ٱلَّذِينَ يَخۡشَوۡنَ رَبَّهُم بِٱلۡغَيۡبِ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَۚ وَمَن تَزَكَّىٰ فَإِنَّمَا يَتَزَكَّىٰ لِنَفۡسِهِۦۚ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلۡمَصِيرُ

Transliteration: (Wa lā taziru wāziratun wizra ukhrā; wa in tadʿu muthqalatun ilā ḥimlihā lā yuḥmal minhu shayʾun walaw kāna dhā qurba; innamā tunziru alladhīna yakhshawna Rabbahum bil-ghaybi wa aqāmū al-ṣalāh; wa man tazakkā fa-innamā yatazakkā linafsih; wa ilā Allāhi al-maṣīr)

और कोई बोझ उठाने वाली जान किसी दूसरी जान का बोझ नहीं उठाएगी [57]; और अगर कोई भारी बोझ वाली जान अपना बोझ उठाने के लिए किसी को पुकारे तो उसमें से कुछ भी न उठाया जाएगा [58] अगरचे वह क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो। ऐ महबूब! आपका डराना तो बस उन्हीं के लिए फ़ायदेमंद है [59] जो अपने रब से बे-देखे डरते हैं [60] और नमाज़ क़ायम करते हैं [61]; और जो कोई पाकीज़ा होता है [62], वह अपने ही भले के लिए पाकीज़ा होता है [63]; और अल्लाह ही की तरफ़ पलटना है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 18

"और कोई बोझ उठाने वाली जान किसी दूसरी जान का बोझ नहीं उठाएगी [57]; और अगर कोई भारी बोझ वाली जान अपना बोझ उठाने के लिए किसी को पुकारे तो उसमें से कुछ भी न उठाया जाएगा [58] अगरचे वह क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो। ऐ महबूब! आपका डराना तो बस उन्हीं के लिए फ़ायदेमंद है [59] जो अपने रब से बे-देखे डरते हैं [60] और नमाज़ क़ायम करते हैं [61]; और जो कोई पाकीज़ा होता है [62], वह अपने ही भले के लिए पाकीज़ा होता है [63]; और अल्लाह ही की तरफ़ पलटना है।"

[57] क़यामत के दिन कोई किसी के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा

क़यामत के दिन कोई शख़्स किसी दूसरे के गुनाहों का ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा कि असल गुनहगार छूट जाए और बे-क़सूर पकड़ा जाए। हर एक को अपने आमाल का जवाब ख़ुद देना होगा। हाँ, जो लोग दूसरों को गुमराह करने वाले पेशवा थे, वे अपनी गुमराही के साथ-साथ अपने पैरोकारों को भटकाने का वबाल भी उठाएंगे।

[58] कोई ख़ुशी से किसी का गुनाह नहीं लेगा — गुमराह पेशवाओं पर अज़ाब

हश्र के मैदान की हौलनाकी में कोई बाप, बेटा या सगा रिश्तेदार अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरे का एक गुनाह भी अपने सर नहीं लेगा। अलबत्ता अल्लाह के हुक्म और अदालत से बद-मज़हबों और गुमराह लीडरों के सर पर उनकी पैरवी करने वालों के गुनाह डाले जाएंगे क्योंकि वे उनकी गुमराही का सबब बने थे।

[59] नबी ﷺ का डराना मोमिनीन के लिए बाइस-ए-नफ़ा

सुब्हानअल्लाह! क्या पाकीज़ा तर्जुमा है! हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ तो सारे जहानों के लिए नज़ीर (डराने वाले) बनकर आए हैं, लेकिन आपके इस इनज़ार व नसीहत से हक़ीक़ी नफ़ा सिर्फ़ वही उठाते हैं जिनके सीनों में ईमान और ख़ुदा का ख़ौफ़ है। मुनकिर अपने हसद की वजह से महरूम रह जाते हैं।

[60] गै़ब पर ईमान — कामिल ईमान की अलामत

मोमिन की शान यह है कि वह अल्लाह को ज़ाहिरी आंखों से देखे बग़ैर, ग़ैब पर कामिल यक़ीन रखता है। मरते वक़्त तो काफ़िर भी हक़ीक़त देखकर ईमान का इज़हार करेगा, मगर वह ईमान क़बूल नहीं होता। नबी-ए-करीम ﷺ का ईमान सबसे आला है क्योंकि आपने शबे मेराज अपनी मुबारक आंखों से जमाल व कुदरते इलाही का मुशाहिदा फ़रमाया।

[61] हुज़ूरे क़ल्ब के साथ नमाज़ क़ायम करना

नमाज़ को उसके तमाम अरकान, शर्तों और हुज़ूरे क़ल्ब के साथ मुसलसल अदा करना दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ और तक्वा पैदा करने का सबसे बड़ा ज़रिया है।

[62] बातिन और ज़ाहिर की पाकीज़गी

पाकीज़गी में अक़ीदे की पाकीज़गी (शिर्क व बिदअत से) और आमाल की पाकीज़गी (गुनाहों और ख़बासत से) दोनों शामिल हैं। जो इंसान अपने दिल और बदन को पाक रखता है उसका सारा नफ़ा उसी की अपनी ज़ात को मिलता है।

[63] कुफ़्र व इंकार से नबी ﷺ को कोई नुक़सान नहीं

ऐ प्यारे महबूब ﷺ! आप उनकी बे-रुखी और तकज़ीब से मुतअस्सिर न हों; अगर सारी दुनिया भी कुफ़्र पर जम जाए तो आपकी शान और मर्तबे में ज़र्रा बराबर कमी नहीं आ सकती। सबको अल्लाह ही की तरफ़ पलटना है और वही इंसाफ़ फ़रमाएगा।

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