Transliteration: (Wa law yu’aakhizul laahun naasa bima kasaboo maa taraka ‘alaa zahrihaa min daaabbatinw wa laakiny yu’akhkhiruhum ilaaa ajalim musamman fa izaa jaaa’a ajaluhum fa innal laaha kaana bi’ibaadihee Baseeraa (section 5))
"और अगर अल्लाह लोगों को उनके करतूतों के बाइस पकड़ने लगे [133], तो ज़मीन की पीठ पर किसी चलने वाले को न छोड़े [134]; लेकिन वह उन्हें एक मुक़र्रर मुद्दत तक मोहलत देता है [135]; फिर जब उनकी मुक़र्ररा मुद्दत आ जाएगी, तो बेशक अल्लाह के तमाम बंदे उसकी नज़र में हैं [136]!"
अगर अल्लाह तआला हर गुनाह पर फ़ौरन पकड़ फ़रमाता, तो तौबा, मग़फ़िरत और मोहलत का कोई क़ानून ही न रहता। उसका करम है कि वह गुनहगारों को संभलने का मौक़ा अता फ़रमाता है।
तमाम कायनात की तख़्लीक़ का मक़सद इंसान है। अगर इंसान को हलाक कर दिया जाए तो दीगर मख़्लूक़ात का वजूद भी ख़त्म हो जाए। इसके अलावा इंसानों के गुनाहों की नहूसत से ज़मीन, हवा और जानवरों पर भी मुसीबतें आती हैं; जैसे तूफ़ाने नूह में काफ़िर इंसानों के साथ-साथ जानवर भी ग़र्क़ हुए थे।
'मुक़र्रर मुद्दत' से मुराद मौत का वक़्त, क़यामत का दिन या अज़ाब का मुअय्यन लम्हा है। अल्लाह अपनी हिकमत से उस वक़्त तक मोहलत फ़रमाता है।
क़यामत के दिन हर बंदे को यह कामिल यक़ीन हो जाएगा कि उसका कोई अमल, कोई सांस और कोई नीयत अल्लाह की नज़र से ओझल नहीं थी। मोमिन को चाहिए कि वह हर हाल में सब्र व इस्तिक़ामत के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िरी का ख़्याल रखे।
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