कुरान - 35:45 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
وَلَوۡ يُؤَاخِذُ ٱللَّهُ ٱلنَّاسَ بِمَا كَسَبُواْ مَا تَرَكَ عَلَىٰ ظَهۡرِهَا مِن دَآبَّةٖ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمۡ إِلَىٰٓ أَجَلٖ مُّسَمّٗىۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمۡ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِعِبَادِهِۦ بَصِيرَۢا

Transliteration: (Wa law yu’aakhizul laahun naasa bima kasaboo maa taraka ‘alaa zahrihaa min daaabbatinw wa laakiny yu’akhkhiruhum ilaaa ajalim musamman fa izaa jaaa’a ajaluhum fa innal laaha kaana bi’ibaadihee Baseeraa (section 5))

और अगर अल्लाह लोगों को उनके करतूतों के बाइस पकड़ने लगे [133], तो ज़मीन की पीठ पर किसी चलने वाले (जानदार) को न छोड़े [134]; लेकिन वह उन्हें एक मुक़र्रर मुद्दत तक मोहलत देता है [135]; फिर जब उनकी मुक़र्ररा मुद्दत आ जाएगी, तो बेशक अल्लाह के तमाम बंदे उसकी नज़र में हैं [136]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 45

"और अगर अल्लाह लोगों को उनके करतूतों के बाइस पकड़ने लगे [133], तो ज़मीन की पीठ पर किसी चलने वाले को न छोड़े [134]; लेकिन वह उन्हें एक मुक़र्रर मुद्दत तक मोहलत देता है [135]; फिर जब उनकी मुक़र्ररा मुद्दत आ जाएगी, तो बेशक अल्लाह के तमाम बंदे उसकी नज़र में हैं [136]!"

[133] मुआफ़ फ़रमाने और मोहलत देने की इलाही सुन्नत

अगर अल्लाह तआला हर गुनाह पर फ़ौरन पकड़ फ़रमाता, तो तौबा, मग़फ़िरत और मोहलत का कोई क़ानून ही न रहता। उसका करम है कि वह गुनहगारों को संभलने का मौक़ा अता फ़रमाता है।

[134] मख़्लूक़ात में इंसान की मरकज़ियत और गुनाहों का असर

तमाम कायनात की तख़्लीक़ का मक़सद इंसान है। अगर इंसान को हलाक कर दिया जाए तो दीगर मख़्लूक़ात का वजूद भी ख़त्म हो जाए। इसके अलावा इंसानों के गुनाहों की नहूसत से ज़मीन, हवा और जानवरों पर भी मुसीबतें आती हैं; जैसे तूफ़ाने नूह में काफ़िर इंसानों के साथ-साथ जानवर भी ग़र्क़ हुए थे।

[135] अज़ाब की मुअय्यन मुद्दत और मोहलत

'मुक़र्रर मुद्दत' से मुराद मौत का वक़्त, क़यामत का दिन या अज़ाब का मुअय्यन लम्हा है। अल्लाह अपनी हिकमत से उस वक़्त तक मोहलत फ़रमाता है।

[136] बंदों का हर लम्हा निगाहे इलाही में होना

क़यामत के दिन हर बंदे को यह कामिल यक़ीन हो जाएगा कि उसका कोई अमल, कोई सांस और कोई नीयत अल्लाह की नज़र से ओझल नहीं थी। मोमिन को चाहिए कि वह हर हाल में सब्र व इस्तिक़ामत के साथ अल्लाह के हुज़ूर हाज़िरी का ख़्याल रखे।

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