कुरान - 35:43 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

43
ٱسۡتِكۡبَارٗا فِي ٱلۡأَرۡضِ وَمَكۡرَ ٱلسَّيِّيِٕۚ وَلَا يَحِيقُ ٱلۡمَكۡرُ ٱلسَّيِّئُ إِلَّا بِأَهۡلِهِۦۚ فَهَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّا سُنَّتَ ٱلۡأَوَّلِينَۚ فَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ ٱللَّهِ تَبۡدِيلٗاۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ ٱللَّهِ تَحۡوِيلًا

Transliteration: (Istikbaaran fil ardi wa makras sayyi’; wa laa yaheequl makrus sayyi’u illaa bi ahlih; fahal yanzuroona illaa sunnatal awwaleen; falan tajida lisunnatil laahi tabdeelanw wa lan tajida lisunnatil laahi tahweela)

ज़मीन में तकब्बुर करने [125] और बुरी साज़िशें रचने की वजह से [126]; और बुरी साज़िश अपने करने वालों ही को घेरती है [127]; तो क्या वे उसी तरीक़े का इंतज़ार कर रहे हैं जो अगलों के साथ हुआ [128]? पस आप अल्लाह के तरीक़े में हरगिज़ कोई तब्दीली न पाएंगे, और न आप अल्लाह के तरीक़े में कोई उलट-फेर पाएंगे [129]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 43 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 43

"ज़मीन में तकब्बुर करने [125] और बुरी साज़िशें रचने की वजह से [126]; और बुरी साज़िश अपने करने वालों ही को घेरती है [127]; तो क्या वे उसी तरीक़े का इंतज़ार कर रहे हैं जो अगलों के साथ हुआ [128]? पस आप अल्लाह के तरीक़े में हरगिज़ कोई तब्दीली न पाएंगे, और न आप अल्लाह के तरीक़े में कोई उलट-फेर पाएंगे [129]!"

[125] तकब्बुर और घमंड — हिदायत की राह में सबसे बड़ी रुकावट

तकब्बुर दिल की ख़बीस बीमारी है जो इंसान को रसूलुल्लाह ﷺ की इताअत से रोक देती है। मक्का के सरदारों को अपनी दौलत और सरदारी का घमंड था, इसलिए वे हक़ के आगे झुकने से महरूम रहे।

[126] काफ़िरों की ख़बीस साज़िशें

ईमान लाने के बजाए वे नबी-ए-पाक ﷺ और मोमिनीन के ख़िलाफ़ दारुन्नदवा में साज़िशें और मक्र रचते रहे।

[127] मक्कारी और साज़िश का वबाल ख़ुद साज़िशी पर पड़ता है

यह क़ानूने इलाही है कि बुरी साज़िश का अंजाम ख़ुद साज़िश करने वाले पर ही उलट कर पड़ता है। जंगे बद्र में कुरैश के सरदार इस्लाम को मिटाने निकले थे, मगर ख़ुद ज़िल्लत के साथ मारे गए।

[128] पिछली मुतकब्बिर क़ौमों के वाक़िआत से इबरत

कुरैश शाम और यमन के तिजारती सफ़रों में क़ौमे आद व समूद के तबाहशुदा खंडरात देखते थे। उन्हें तंबीह की जा रही है कि क्या तुम भी उसी अज़ाब का इंतज़ार कर रहे हो?

[129] अल्लाह का क़ानून अटल और ग़ैर-मुतबद्दिल है

अल्लाह की सुन्नत और उसका क़ानून कभी नहीं बदलता। जो हक़ की तकज़ीब और तकब्बुर करेगा वह हलाक होगा, और अंबिया के मौजिज़ात भी इसी क़ानूने इलाही का इज़हार हैं।

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