Transliteration: (Istikbaaran fil ardi wa makras sayyi’; wa laa yaheequl makrus sayyi’u illaa bi ahlih; fahal yanzuroona illaa sunnatal awwaleen; falan tajida lisunnatil laahi tabdeelanw wa lan tajida lisunnatil laahi tahweela)
"ज़मीन में तकब्बुर करने [125] और बुरी साज़िशें रचने की वजह से [126]; और बुरी साज़िश अपने करने वालों ही को घेरती है [127]; तो क्या वे उसी तरीक़े का इंतज़ार कर रहे हैं जो अगलों के साथ हुआ [128]? पस आप अल्लाह के तरीक़े में हरगिज़ कोई तब्दीली न पाएंगे, और न आप अल्लाह के तरीक़े में कोई उलट-फेर पाएंगे [129]!"
तकब्बुर दिल की ख़बीस बीमारी है जो इंसान को रसूलुल्लाह ﷺ की इताअत से रोक देती है। मक्का के सरदारों को अपनी दौलत और सरदारी का घमंड था, इसलिए वे हक़ के आगे झुकने से महरूम रहे।
ईमान लाने के बजाए वे नबी-ए-पाक ﷺ और मोमिनीन के ख़िलाफ़ दारुन्नदवा में साज़िशें और मक्र रचते रहे।
यह क़ानूने इलाही है कि बुरी साज़िश का अंजाम ख़ुद साज़िश करने वाले पर ही उलट कर पड़ता है। जंगे बद्र में कुरैश के सरदार इस्लाम को मिटाने निकले थे, मगर ख़ुद ज़िल्लत के साथ मारे गए।
कुरैश शाम और यमन के तिजारती सफ़रों में क़ौमे आद व समूद के तबाहशुदा खंडरात देखते थे। उन्हें तंबीह की जा रही है कि क्या तुम भी उसी अज़ाब का इंतज़ार कर रहे हो?
अल्लाह की सुन्नत और उसका क़ानून कभी नहीं बदलता। जो हक़ की तकज़ीब और तकब्बुर करेगा वह हलाक होगा, और अंबिया के मौजिज़ात भी इसी क़ानूने इलाही का इज़हार हैं।
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