Transliteration: (Wa aqsamoo billaahi jahda aymaanihim la’in jaaa’ahum nazeerul layakoonunna ahdaa min ihdal umami falam maa jaaa’ahum nazeerum maa zaadahum illaa nufooraa)
"और उन्होंने अल्लाह की सख़्त-सख़्त क़समें खाई थीं [123] कि अगर उनके पास कोई डराने वाला आया तो वे तमाम उम्मतों से बढ़कर हिदायत याफ़्ता होंगे [124]; फिर जब उनके पास डराने वाला आ गया, तो इस बात ने उनकी नफ़रत ही में इज़ाफ़ा किया;"
हुज़ूर ﷺ की बेअसत से पहले कुरैश के लोग यहूद व नसारा की बद-अमली देखकर काबा शरीफ़ में खड़े होकर क़समें खाते थे कि अगर हमारे पास कोई नबी आया तो हम यहूदियों और ईसाइयों की तरह नाफ़रमानी नहीं करेंगे बल्कि सबसे बढ़-चढ़ कर पैरवी करेंगे।
वे दावा करते थे कि हम सब उम्मतों से बढ़कर हिदायत याफ़्ता बनेंगे। लेकिन जब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ नबी बनकर तशरीफ़ लाए, तो हसद, तकब्बुर और बुतपरस्ती की ज़िद ने उन्हें हक़ की पैरवी के बजाए नफ़रत और दुश्मनी में मुब्तला कर दिया।
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