कुरान - 35:40 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
قُلۡ أَرَءَيۡتُمۡ شُرَكَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَرُونِي مَاذَا خَلَقُواْ مِنَ ٱلۡأَرۡضِ أَمۡ لَهُمۡ شِرۡكٞ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ أَمۡ ءَاتَيۡنَٰهُمۡ كِتَٰبٗا فَهُمۡ عَلَىٰ بَيِّنَتٖ مِّنۡهُۚ بَلۡ إِن يَعِدُ ٱلظَّـٰلِمُونَ بَعۡضُهُم بَعۡضًا إِلَّا غُرُورًا

Transliteration: (Qul ara’aytum shurakaaa’a kumul lazeena tad’oona min doonil laahi; aroonee maazaa khalaqoo minal ardi am lahum shirkun fis samaawaati am aatainaahum Kitaaban fahum ‘alaa baiyinatim minh; bal iny ya’iduz zaalimoona ba ‘duhum ba’dan illaa ghurooraa)

आप फ़रमाइए, "भला देखो तो सही अपने उन शरीकों को जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो [115]; मुझे दिखाओ कि उन्होंने ज़मीन में से क्या पैदा किया है [116], या आसमानों में उनकी कोई शिरकत है [117]? या हमने उन्हें कोई ऐसी किताब दी है जिसकी रौशन दलील पर वे क़ायम हों [118]? बल्कि ज़ालिम एक-दूसरे से सिर्फ़ धोखे का वादा करते हैं [119]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 40

"आप फ़रमाइए: 'भला देखो तो सही अपने उन शरीकों को जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो [115]; मुझे दिखाओ कि उन्होंने ज़मीन में से क्या पैदा किया है [116], या आसमानों में उनकी कोई शिरकत है [117]? या हमने उन्हें कोई ऐसी किताब दी है जिसकी रौशन दलील पर वे क़ायम हों [118]? बल्कि ज़ालिम एक-दूसरे से सिर्फ़ धोखे का वादा करते हैं [119]!'"

[115] बुतों के बातिल माबूद होने का रद्द

यह आयत मुशरिक़ीने अरब के तराशे हुए बे-जान बुतों के बारे में है। अरब के काफ़िर अंबिया व औलिया को नहीं पूजते थे बल्कि लात, उज़्ज़ा और मनात जैसे पत्थरों को पूजते थे। इस आयत से बुतपरस्ती का मुकम्मल बुतलान साबित होता है।

[116] ज़मीन का वाहिद ख़ालिक़ सिर्फ़ अल्लाह है

काफ़िर भी यह मानते थे कि ज़मीन का ख़ालिक़ अल्लाह है, उन्होंने कभी अपने बुतों को ज़मीन का ख़ालिक़ नहीं कहा। पस जब वे किसी ज़र्रे के ख़ालिक़ नहीं तो माबूद कैसे हो सकते हैं?

[117] आसमानों में किसी की कोई शिरकत नहीं — इताअत और इबादत का फ़र्क़

आसमानों की तख़्लीक़ और निज़ाम में किसी का कोई साझा नहीं। यहाँ यह उसूल याद रखें कि इबादत सिर्फ़ अल्लाह के लिए मख़्सूस है, जबकि इताअत और ताज़ीम रसूलुल्लाह ﷺ, वालिदैन और हाकिमे आदिल की भी शरीअत में मतलूब है। ताज़ीम को इबादत समझ लेना गुमराहों की भारी ग़लती है।

[118] बुतपरस्ती के हक़ में कोई आसमानी या अक़्ली सनद नहीं

किसी भी आसमानी किताब में बुतों की पूजा का कोई हुक्म नहीं आया और न कोई अक़्ली दलील मौजूद है।

[119] मुशरिकीन के सरदारों के झूठे वादे और फ़रेब

काफ़िरों के बड़े अपने अवाम को बहकाते थे कि ये बुत अल्लाह के यहाँ हमारी शफ़ाअत करेंगे। यह ख़ालिस शैतानी धोखा और फ़रेब था जिसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now