Transliteration: (Qul ara’aytum shurakaaa’a kumul lazeena tad’oona min doonil laahi; aroonee maazaa khalaqoo minal ardi am lahum shirkun fis samaawaati am aatainaahum Kitaaban fahum ‘alaa baiyinatim minh; bal iny ya’iduz zaalimoona ba ‘duhum ba’dan illaa ghurooraa)
"आप फ़रमाइए: 'भला देखो तो सही अपने उन शरीकों को जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो [115]; मुझे दिखाओ कि उन्होंने ज़मीन में से क्या पैदा किया है [116], या आसमानों में उनकी कोई शिरकत है [117]? या हमने उन्हें कोई ऐसी किताब दी है जिसकी रौशन दलील पर वे क़ायम हों [118]? बल्कि ज़ालिम एक-दूसरे से सिर्फ़ धोखे का वादा करते हैं [119]!'"
यह आयत मुशरिक़ीने अरब के तराशे हुए बे-जान बुतों के बारे में है। अरब के काफ़िर अंबिया व औलिया को नहीं पूजते थे बल्कि लात, उज़्ज़ा और मनात जैसे पत्थरों को पूजते थे। इस आयत से बुतपरस्ती का मुकम्मल बुतलान साबित होता है।
काफ़िर भी यह मानते थे कि ज़मीन का ख़ालिक़ अल्लाह है, उन्होंने कभी अपने बुतों को ज़मीन का ख़ालिक़ नहीं कहा। पस जब वे किसी ज़र्रे के ख़ालिक़ नहीं तो माबूद कैसे हो सकते हैं?
आसमानों की तख़्लीक़ और निज़ाम में किसी का कोई साझा नहीं। यहाँ यह उसूल याद रखें कि इबादत सिर्फ़ अल्लाह के लिए मख़्सूस है, जबकि इताअत और ताज़ीम रसूलुल्लाह ﷺ, वालिदैन और हाकिमे आदिल की भी शरीअत में मतलूब है। ताज़ीम को इबादत समझ लेना गुमराहों की भारी ग़लती है।
किसी भी आसमानी किताब में बुतों की पूजा का कोई हुक्म नहीं आया और न कोई अक़्ली दलील मौजूद है।
काफ़िरों के बड़े अपने अवाम को बहकाते थे कि ये बुत अल्लाह के यहाँ हमारी शफ़ाअत करेंगे। यह ख़ालिस शैतानी धोखा और फ़रेब था जिसका हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं।
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