कुरान - 35:39 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
هُوَ ٱلَّذِي جَعَلَكُمۡ خَلَـٰٓئِفَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ فَمَن كَفَرَ فَعَلَيۡهِ كُفۡرُهُۥۖ وَلَا يَزِيدُ ٱلۡكَٰفِرِينَ كُفۡرُهُمۡ عِندَ رَبِّهِمۡ إِلَّا مَقۡتٗاۖ وَلَا يَزِيدُ ٱلۡكَٰفِرِينَ كُفۡرُهُمۡ إِلَّا خَسَارٗا

Transliteration: (Huwal lazee ja’alakum khalaaa’ifa fil ard; faman kafara fa’alaihi kufruhoo; wa laa yazeedul kaafireena kufruhum ‘inda Rabbihim illaa maqtanw wa laa yazeedul kaafireena kufruhum illaa khasaaraa)

वही है जिसने तुम्हें ज़मीन में जानशीन बनाया [111]; पस जिसने कुफ़्र किया तो उसके कुफ़्र का वबाल उसी पर होगा [112]; और काफ़िरों को उनका कुफ़्र उनके रब के नज़दीक बेज़ारी (ग़ज़ब) के सिवा कुछ नहीं बढ़ाता [113], और काफ़िरों को उनका कुफ़्र नुक़सान के सिवा कुछ नहीं बढ़ाता [114]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 39

"वही है जिसने तुम्हें ज़मीन में जानशीन बनाया [111]; पस जिसने कुफ़्र किया तो उसके कुफ़्र का वबाल उसी पर होगा [112]; और काफ़िरों को उनका कुफ़्र उनके रब के नज़दीक बेज़ारी के सिवा कुछ नहीं बढ़ाता [113], और काफ़िरों को उनका कुफ़्र नुक़सान के सिवा कुछ नहीं बढ़ाता [114]!"

[111] ज़मीन में जानशीन और दुनिया की आरज़ी हैसियत

अल्लाह ने तुम्हें पिछली हलाक होने वाली क़ौमों के बाद ज़मीन का ख़लीफ़ा (जानशीन) बनाया ताकि तुम उनके महलात और दौलत के वारिस बनकर इबरत हासिल करो और अल्लाह की इताअत करो।

[112] कुफ़्र की इन्फ़िरादी और इज्तिमाई ज़िम्मेदारी

आख़िरत में कुफ़्र की सज़ा सिर्फ़ उसी शख़्स को मिलेगी जिसने कुफ़्र किया। अलबत्ता दुनियावी अज़ाब जब किसी बस्ती पर आता है तो गुनाहों की नहूसत से आम लोग भी मुतअस्सिर होते हैं।

[113] कुफ़्र से सिर्फ़ ग़ज़बे इलाही में इज़ाफ़ा होता है

काफ़िर अगर ज़ाहिरी तौर पर कोई नेक काम (जैसे सदक़ा या ख़िदमत) भी करे, तो बग़ैर ईमान के वह अल्लाह की बारगाह में क़बूल नहीं होता; बल्कि उसका कुफ़्र अल्लाह की सख़्त नाराज़गी और बेज़ारी (मक़्त) ही को बढ़ाता है।

[114] कुफ़्र दोनों जहानों में सरासर ख़सारा है

जिस तरह शदीद बीमार को ग़िज़ा नुक़सान पहुँचाती है, उसी तरह मुआनद काफ़िर के सामने जितनी आयतें और मौजिज़ात आते हैं, वह हसद व इंकार में उतना ही आगे बढ़ता है और दोनों जहानों में अपना नुक़सान (ख़सारा) बढ़ा लेता है।

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