कुरान - 35:37 सूरह फातिर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
وَهُمۡ يَصۡطَرِخُونَ فِيهَا رَبَّنَآ أَخۡرِجۡنَا نَعۡمَلۡ صَٰلِحًا غَيۡرَ ٱلَّذِي كُنَّا نَعۡمَلُۚ أَوَلَمۡ نُعَمِّرۡكُم مَّا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَن تَذَكَّرَ وَجَآءَكُمُ ٱلنَّذِيرُۖ فَذُوقُواْ فَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِن نَّصِيرٍ

Transliteration: (Wa hum yastarikhoona feehaa Rabbanaa akhrijnaa na’mal saalihan ghairal lazee kunnaa na’mal; awa lamnu ‘ammirkum maa yatazak karu feehi man tazakkara wa jaaa’akumun nazeeru fazooqoo famaa lizzaalimeena min naseer (section 4))

और वे उसमें चिल्लाएंगे [104], "ऐ हमारे रब! हमें (यहाँ से) निकाल ले [105], हम नेक अमल करेंगे उस अमल के बरअक्स जो हम किया करते थे [106]!" (अल्लाह फ़रमाएगा) "क्या हमने तुम्हें इतनी उम्र न दी थी जिसमें जो नसीहत हासिल करना चाहता वह नसीहत हासिल कर सकता था [107] [108]? और तुम्हारे पास डराने वाला भी आया था; पस अब मज़ा चखो, तो ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं [109]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फातिर आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ातिर तफ़सीर - आयत 37

"और वे उसमें चिल्लाएंगे [104]: 'ऐ हमारे रब! हमें निकाल ले [105], हम नेक अमल करेंगे उस अमल के बरअक्स जो हम करते थे [106]!' क्या हमने तुम्हें इतनी उम्र न दी थी जिसमें जो नसीहत हासिल करना चाहता वह नसीहत हासिल कर सकता था [107] [108]? और तुम्हारे पास डराने वाला आया था; पस अब मज़ा चखो, तो ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं [109]!"

[104] दोज़ख़ियों की चीख़ व पुकार और हसरत

जहन्नुम में काफ़िर बिलबिलाएंगे, दरोगा-ए-जहन्नुम से फ़रियाद करेंगे और आपस में एक-दूसरे को लानत भेजेंगे, मगर कोई उनकी फ़रियाद नहीं सुनेगा।

[105] दुनिया में वापस लौटने की नामुमकिन आरज़ू

वे दुनिया में दोबारा भेजे जाने की भीख मांगेंगे ताकि वे ईमान ला सकें। मगर दुनिया दारुल अमल थी जो ख़त्म हो चुकी, अब सिर्फ़ दारुल जज़ा है जहाँ अमल का मौक़ा दोबारा नहीं दिया जाएगा। गुनहगार मोमिन तो निकाल लिए जाएंगे, मगर काफ़िर हमेशा रहेंगे।

[106] आमाल और नीयत को बदलने की फ़रियाद

वे कहेंगे कि हम अपने पिछले आमाल और बातिल अक़ीदों के बरअक्स नेक काम करेंगे, मगर उनकी यह तौबा उस वक़्त हरगिज़ क़बूल नहीं होगी।

[107] उम्र की मोहलत — काफ़िरों के ना-बालिग बच्चों का हुक्म

अल्लाह फ़रमाएगा कि क्या तुम्हें सोचने-समझने के लिए काफ़ी उम्र (साठ या चालीस साल) नहीं दी गई थी? उलमा फ़रमाते हैं कि इस आयत से साबित होता है कि मुशरिकों के वे बच्चे जो ना-बालिगी में मर गए दोज़ख़ में नहीं जाएंगे, क्योंकि उन्हें सोचने और अमल करने की उम्र नहीं मिली थी; वे जन्नत में जाएंगे।

[108] हुज्जत की तकमील — फ़ितरत पर जीने वाले

जिन लोगों तक किसी पैग़ंबर की दावत नहीं पहुँची (फ़तरत का ज़माना) और वे सिर्फ़ तौहीद पर रहे, उन पर अज़ाब नहीं होगा; क्योंकि अज़ाब हुज्जत पूरी होने और पैग़ंबर के आने के बाद होता है।

[109] ज़ालिमों (काफ़िरों) का कोई मददगार या शफ़ीअ नहीं

'ज़ालिमों' से मुराद यहाँ काफ़िर व मुशरिक़ हैं। क़यामत के दिन काफ़िरों का कोई मददगार, दोस्त या शफ़ाअत करने वाला नहीं होगा। अहले ईमान के लिए तो अंबिया, औलिया और शुहदा शफ़ाअत फ़रमाएंगे, मगर काफ़िर इस रहमत से हमेशा के लिए महरूम रहेंगे।

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