Transliteration: (Wallazeena kafaroo lahum naaru Jahannama laa yuqdaa 'alaihim fa yamootoo wa laa yukhaffafu ‘anhum min ‘azaabihaa; kazaalika najzee kulla kafoor)
"और जिन लोगों ने कुफ़्र किया [100], उनके लिए जहन्नुम की आग है; न उन पर मौत का फ़ैसला किया जाएगा कि वे मर जाएं [101], और न उनसे उसका अज़ाब हल्का किया जाएगा [102]; हम हर ना-शुकरे को ऐसा ही बदला देते हैं [103]।"
यह हुक्म उन लोगों के लिए है जिनका ख़ात्मा कुफ़्र पर हुआ। इंसान का एतबार उसके ख़ात्मे पर है; जो कुफ़्र पर मरा वह कभी दोज़ख़ से नहीं निकल सकेगा।
काफ़िरों को जहन्नुम में मौत नहीं आएगी कि उनकी जान छूट जाए। अलबत्ता गुनहगार अहले ईमान जो जहन्नुम में जाएंगे, वे अपनी मुद्दत पूरी करके कोयला हो जाएंगे, फिर नबी-ए-करीम ﷺ और औलिया की शफ़ाअत से उन्हें निकाल कर आबे हयात (माउल हयात) से नहलाया जाएगा और वे सब्ज़े की तरह तरो-ताज़ा होकर जन्नत में दाख़िल होंगे (हदीस शरीफ़)।
काफ़िरों के अज़ाब में एक लम्हे के लिए भी कोई कमी या तख़्फ़ीफ़ नहीं की जाएगी; उनका अज़ाब दायमी और मुसलसल होगा।
कुफ़्र अल्लाह की नेमतों की सबसे बड़ी ना-शुक्री है। जो शख़्स अल्लाह की मारिफ़त और उसके रसूल की दावत को ठुकराए, उसकी सज़ा यही दायमी आग है।
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