Transliteration: (Alhamdu lillaahi faatiris samaawaati wal ardi jaa'ilil malaaa'ikati rusulan uleee ajnihatim masnaa wa sulaasa wa rubaa'; yazeedu fil khalqi maa yashaaa'; innal laaha 'alaa kulli shai'in Qadeer)
"तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जो आसमानों और ज़मीन का पैदा फ़रमाने वाला है [1] [2], फ़रिश्तों को पैग़ाम पहुंचाने वाला क़ासिद बनाने वाला है [3] जिनके दो-दो, तीन-तीन और चार-चार पर (बाज़ू) हैं [4]; वह पैदाइश में जो चाहता है इज़ाफ़ा फ़रमाता है [5]; बेशक अल्लाह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखने वाला है।"
इस सूरह का दूसरा मशहूर नाम सूरह अल-मलाइकह है, जिसका अर्थ है "फ़रिश्तों वाली सूरह", क्योंकि इसमें अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों की तख़्लीक़, उनके बाज़ुओं (परों) और अंबिया-ए-किराम की ख़िदमत में उनकी रिसालत का तफ़सीली ज़िक्र फ़रमाया है।
हक़ीक़ी या मिज़ाजी हर तारीफ़ ब-ज़ाते ख़ुद अल्लाह ही के लिए मख़्सूस है। इससे यह भी मालूम हुआ कि अक़्ले सलीम अल्लाह की मारिफ़त व हक़ीक़त तक पहुँचने का वसीला है, जो इंसान को कायनात के मुशाहिदे से ख़ालिक़ की पहचान कराती है।
फ़रिश्तों में सबसे अफ़ज़ल व आला मक़ाम उन मुक़र्रब फ़रिश्तों का है जो अल्लाह तआला की तरफ़ से अंबिया-ए-किराम की बारगाह में वही और पैग़ाम लाते हैं। वे अंबिया के क़ासिद और बारगाहे रिसालत के ख़ादिम हैं।
फ़रिश्तों के दो, तीन, चार या उससे ज़ायद पर उनकी रूहानी ताक़त, मर्तबे और परवाज़ की सुरअत (तेज़ी) के ऐतबार से हैं। तफ़सीरे रूहुल बयान में है कि फ़रिश्ते पलक झपकते ही आसमान से ज़मीन का फ़ासला तय कर लेते हैं। यहाँ दो, तीन और चार का ज़िक्र हस्र (पाबंदी) के लिए नहीं है; हुज़ूर अकरम ﷺ ने मेराज की रात हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम को छह सौ (600) बाज़ुओं के साथ देखा था। फ़रिश्तों के पर परिंदों जैसे गोश्त-पोस्त के नहीं होते बल्कि नूरी होते हैं।
अल्लाह तआला अपनी मख़्लूक़ात में से जिसे चाहता है हुस्ने सूरत, हुस्ने आवाज़, ताक़त, इल्म और औसाफ़ में इज़ाफ़ा अता फ़रमाता है। इंसान, जिन्नात, फ़रिश्ते, नबातात और हैवानात हर एक में अल्लाह की क़ुदरत के अनगिनत नमूने और विविधता मौजूद है।
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