कुरान - 41:14 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
إِذۡ جَآءَتۡهُمُ ٱلرُّسُلُ مِنۢ بَيۡنِ أَيۡدِيهِمۡ وَمِنۡ خَلۡفِهِمۡ أَلَّا تَعۡبُدُوٓاْ إِلَّا ٱللَّهَۖ قَالُواْ لَوۡ شَآءَ رَبُّنَا لَأَنزَلَ مَلَـٰٓئِكَةٗ فَإِنَّا بِمَآ أُرۡسِلۡتُم بِهِۦ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Iz jaaa'at humur Rusulu mim baini aydeehim wa min khalfihim allaa ta'budooo illal laaha qaaloo law shaaa'a Rabunaa la anzala malaaa 'ikatan fa innaa bimaaa ursiltum bihee kaafiroon)

जब उनके पास रसूल उनके आगे से और उनके पीछे से आए [35] कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो; तो उन्होंने कहा [36]: अगर हमारा रब चाहता तो फ़रिश्तों को उतार देता [37], पस जिसके साथ तुम्हें भेजा गया है हम उसका इन्कार करते हैं [38]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 14

जब उनके पास रसूल उनके आगे से और उनके पीछे से आए [35] कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो; तो उन्होंने कहा [36]: अगर हमारा रब चाहता तो फ़रिश्तों को उतार देता [37], पस जिसके साथ तुम्हें भेजा गया है हम उसका इन्कार करते हैं [38]!

[35] अंबिया-ए-किराम की मुसलसल तब्लीग़ी जद्दोजहद

रसूलों का आगे और पीछे से आने का मतलब यह है कि उन्होंने अपनी उम्मतों को हर रुख़ और हर अंदाज़ से समझाया—मुहब्बत से, दलीलों से, नसीहत से और अज़ाब से डरा कर। उन्होंने तब्लीग़ का कोई रास्ता नहीं छोड़ा, जिससे साबित हुआ कि काफ़िरों का इन्कार किसी कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके अपने हठ और तकब्बुर की बिना पर था।

[36] काफ़िरों पर ईमान लाने की फ़र्ज़ियत

इससे साबित होता है कि कुफ़्फ़ार व मुशरिक़ीन भी ईमान लाने के मुकल्लफ़ हैं। जब वे ईमान ले आएं, तभी नमाज़ व रोज़ा वग़ैरा के मुकल्लफ़ होंगे।

[37] बशरीय रसूल पर बातिल एतराज़

काफ़िरों की यह पुरानी बदबख़्ती थी कि वे इंसानी रसूल की रिसालत का इन्कार करते और कहते कि अगर अल्लाह को रसूल भेजना होता तो फ़रिश्तों को भेजता। यह उनकी नाअक़्ली थी कि बेजान पत्थरों को माबूद मानते थे मगर मुक़द्दस इंसानों के नबी होने पर ताज्जुब करते थे!

[38] रसूल का इन्कार अल्लाह का इन्कार है

काफ़िरों का यह कहना कि "हम तुम्हारी लाई हुई शरीअत का इन्कार करते हैं" दरअसल अल्लाह तआला ही का इन्कार था। रसूल का इन्कार बराहे-रास्त ख़ालिक़ का इन्कार है।

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