कुरान - 41:24 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
فَإِن يَصۡبِرُواْ فَٱلنَّارُ مَثۡوٗى لَّهُمۡۖ وَإِن يَسۡتَعۡتِبُواْ فَمَا هُم مِّنَ ٱلۡمُعۡتَبِينَ

Transliteration: (Fa-iny yasbiroo fan Naaru maswal lahum wa iny-yasta'tiboo famaa hum minal mu'tabeen)

पस अगर वे सब्र करें [61] तो भी आग ही उनका ठिकाना है [62], और अगर वे (अल्लाह को) राज़ी करना चाहें तो भी वे राज़ी किए जाने वालों में से न होंगे [63]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 24

पस अगर वे सब्र करें [61] तो भी आग ही उनका ठिकाना है [62], और अगर वे (अल्लाह को) राज़ी करना चाहें तो भी वे राज़ी किए जाने वालों में से न होंगे [63]!

[61] दोज़ख़ में सब्र की बेफ़ायदगी

दुनिया में मुसीबत पर सब्र करना बाइस-ए-सवाब और दर्जा-ए-क़ुर्ब होता है, लेकिन जहन्नम के अज़ाब में काफ़िर चाहे सब्र करें या चीख़ो-पुकार करें, दोनों बराबर हैं। वहां सब्र करने से भी अज़ाब में कोई कमी नहीं होगी।

[62] आग ही मुस्तक़िल ठिकाना

जहन्नम उनका दायमी और कभी न बदलने वाला ठिकाना है जिससे रिहाई का कोई इमकान नहीं। अल्लाह तआला हम सबको अपने करम से दोज़ख़ की आग से महफ़ूज़ फ़रमाए।

[63] तौबा और फ़रियाद का दरवाज़ा बंद

दुनिया दारुल-अमल थी जहां तौबा क़बूल होती थी; आख़िरत दारुल-जज़ा है जहां तौबा या राज़ी करने की कोई गुंजाइश नहीं। वहां उनकी कोई फ़रियाद नहीं सुनी जाएगी और न ही उन्हें कोई उज़्र पेश करने की इजाज़त होगी।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now