कुरान - 41:26 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَا تَسۡمَعُواْ لِهَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانِ وَٱلۡغَوۡاْ فِيهِ لَعَلَّكُمۡ تَغۡلِبُونَ

Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafaroo laa tasma'oo lihaazal Quraani walghaw feehi la'allakum taghliboon)

और काफ़िरों ने कहा [68]: इस क़ुरआन को सुनो ही मत और (जब यह पढ़ा जाए तो) इसमें शोर-गुल मचाओ [69] ताकि शायद तुम ग़ालिब आ जाओ [70]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 26

और काफ़िरों ने कहा [68]: इस क़ुरआन को सुनो ही मत और (जब यह पढ़ा जाए तो) इसमें शोर-गुल मचाओ [69] ताकि शायद तुम ग़ालिब आ जाओ [70]!

[68] क़ुरआन की आवाज़ दबाने की साज़िश

क़ुरैश के सरदारों ने आपस में तय किया कि न तो ख़ुद क़ुरआन सुनो और न दूसरों को सुनने दो, क्योंकि वे जानते थे कि क़ुरआन के कलाम में ऐसी तासीर और मोजिज़ा है कि जो इसे संजीदगी से सुन लेगा वह इसका गिरवीदा हो जाएगा। इसलिए वे लोगों को रोकने की साज़िशें करते थे।

[69] तिलावत के वक़्त शोर मचाना मुशरिक़ाना अमल

जब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन की तिलावत फ़रमाते, तो मुशरिक़ीन तालियां बजाते, सीटियां मारते और शोर मचाते ताकि आवाज़ दब जाए। उलमा-ए-किराम फ़रमाते हैं कि क़ुरआन की तिलावत के वक़्त शोर मचाना, बातें करना या गाना-बजाना मुशरिकों का तरीक़ा है और सख़्त हराम व गुनाह है। तिलावत के वक़्त मुकम्मल अदब व ख़ामोशी वाजिब है।

[70] हक़ को दबाने की नाकाम कोशिश

काफ़िरों का ख़्याल था कि शोर मचा कर वे नबी करीम ﷺ को तिलावत से रोक देंगे और बाज़ी जीत लेंगे, मगर अल्लाह तआला ने अपने कलाम की हिफ़ाज़त फ़रमाई और उनकी तमाम साज़िशों को नाकाम व रुसवा कर दिया।

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