कुरान - 41:28 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
ذَٰلِكَ جَزَآءُ أَعۡدَآءِ ٱللَّهِ ٱلنَّارُۖ لَهُمۡ فِيهَا دَارُ ٱلۡخُلۡدِ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ بِـَٔايَٰتِنَا يَجۡحَدُونَ

Transliteration: (Zaalika jazaaa'u a'daaa'il laahin Naaru lahum feehaa daarul khuld, jazaaa'am bimaa kaanoo bi aayaatinaa yajhadoon)

यह अल्लाह के दुश्मनों का बदला है [73]: आग! जिसमें उनके लिए हमेशा रहने का घर है [74]; उस बात के बदले जो वे हमारी आयतों का इन्कार किया करते थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 28

यह अल्लाह के दुश्मनों का बदला है [73]: आग! जिसमें उनके लिए हमेशा रहने का घर है [74]; उस बात के बदले जो वे हमारी आयतों का इन्कार किया करते थे।

[73] अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मन

जो लोग अल्लाह तआला, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और क़ुरआन करीम की मुख़ालिफ़त करते हैं, दीने हक़ का मज़ाक़ उड़ाते हैं और लोगों को हिदायत से रोकते हैं, उन्हें 'अल्लाह के दुश्मन' क़रार दिया गया है। उनकी यह दुश्मनी सिर्फ़ कुफ़्र तक महदूद न थी बल्कि अहले हक़ को सताने और कलाम-ए-इलाही को दबाने की मुसलसल कोशिशों पर मुश्तमिल थी।

[74] जहन्नम की आग में दायमी क़ियाम

ऐसे दुश्मनान-ए-दीन का हक़ीक़ी और इंसाफ़ पर मबनी बदला जहन्नम की आग है जिसमें वे हमेशा-हमेशा रहेंगे। यह अज़ाब किसी जुर्म की बे-इंसाफ़ी नहीं बल्कि उनके उस कुफ़्र व सरकशी का बदला है जो उन्होंने रौशन निशानियों और मोजिज़ात को देख कर भी इख़्तियार किया था।

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