कुरान - 41:30 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُواْ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسۡتَقَٰمُواْ تَتَنَزَّلُ عَلَيۡهِمُ ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةُ أَلَّا تَخَافُواْ وَلَا تَحۡزَنُواْ وَأَبۡشِرُواْ بِٱلۡجَنَّةِ ٱلَّتِي كُنتُمۡ تُوعَدُونَ

Transliteration: (Innal lazeena qaaloo Rabbunal laahu summas taqaamoo tatanazzalu 'alaihimul malaaa 'ikatu allaa takhaafoo wa laa tahzanoo wa abshiroo bil Jannnatil latee kuntum too'adoon)

बेशक जिन लोगों ने कहा: 'हमारा रब अल्लाह है' [79], फिर वे उस पर साबित-क़दम रहे [80], उन पर फ़रिश्ते उतरते हैं [81] (और कहते हैं:) न तुम डरो और न ग़म करो [82], और उस जन्नत की ख़ुशख़बरी से शादमान हो जाओ जिसका तुमसे वादा किया जाता था [83]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 30

बेशक जिन लोगों ने कहा: 'हमारा रब अल्लाह है' [79], फिर वे उस पर साबित-क़दम रहे [80], उन पर फ़रिश्ते उतरते हैं [81] (और कहते हैं:) न तुम डरो और न ग़म करो [82], और उस जन्नत की ख़ुशख़बरी से शादमान हो जाओ जिसका तुमसे वादा किया जाता था [83]!

[79] अल्लाह को रब मानना और तौहीद का इक़रार

यह कहना कि 'हमारा रब अल्लाह है' सिर्फ़ ज़बानी दावा नहीं बल्कि तमाम अंबिया की तालीमात और उनके हुक़ूक़ को दिल व जान से तस्लीम करना है। जो अल्लाह को अपना मालिक व रब मानता है, वह उसकी रज़ा में राज़ी रहता है, नेअमत पर शुक्र और मुसीबत पर सब्र करता है।

[80] ईमान पर इस्तक़ामत

इस्तक़ामत यह है कि इंसान ज़िंदगी के हर मोड़ पर—ख़ुशी हो या ग़म, फ़क़्र हो या तवंगरी—दीने हक़ और सुन्नत-ए-रसूल पर जमा रहे और दम-ए-वापसीं तक अपने अक़ीदे में कोई तब्दीली न आने दे। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया: 'इस्तक़ामत यह है कि अल्लाह के साथ किसी को शरीक न ठहराया जाए और नेक आमाल पर साबित-क़दमी इख़्तियार की जाए।'

[81] मौत के वक़्त फ़रिश्तों का नुज़ूल

जब मोमिन का आख़िरी वक़्त आता है, तो रहमत के फ़रिश्ते नूरानी सूरतों और जन्नत के फूलों के साथ नाज़िल होते हैं और बंदा-ए-मोमिन के दिल को तस्कीन व सुकून (सकीना) अता फ़रमाते हैं।

[82] न ख़ौफ़ न ग़म

फ़रिश्ते बशारत देते हैं कि आने वाली मंज़िलों (क़ब्र व हश्र) का कोई ख़ौफ़ न करो, और जो दुनिया में अहल-ओ-अयाल छोड़ आए हो उनका कोई ग़म न करो; अल्लाह तआला तुम्हारा और तुम्हारे अहल-ओ-अयाल का निगहबान है।

[83] जन्नत की बशारत और विसाल की ख़ुशी

उन्हें जन्नत की नेअमतों और दीदार-ए-इलाही की ख़ुशख़बरी दी जाती है। यही वजह है कि औलिया-ए-किराम के विसाल के दिन को 'उर्स' (शादी व विसाल की ख़ुशी) कहा जाता है क्योंकि यह रब की रहमत से मुलाक़ात का दिन है।

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