कुरान - 41:41 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

41
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِٱلذِّكۡرِ لَمَّا جَآءَهُمۡۖ وَإِنَّهُۥ لَكِتَٰبٌ عَزِيزٞ

Transliteration: (Innal Lazeena kafaroo biz Zikri lammaa jaa'ahum wa innahoo la Kitaabun 'Azeez)

बेशक जिन लोगों ने नसीहत (क़ुरआन) का इन्कार किया जब वह उनके पास आई [110] [111] (वे तबाह होंगे); और बेशक यह यक़ीनन एक इंतिहाई बा-इज़्ज़त (ग़ालिब) किताब है [112]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 41 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 41

बेशक जिन लोगों ने नसीहत (क़ुरआन) का इन्कार किया जब वह उनके पास आई [110] [111] (वे तबाह होंगे); और बेशक यह यक़ीनन एक इंतिहाई बा-इज़्ज़त (ग़ालिब) किताब है [112];

[110] ज़िक्र (क़ुरआन व साहिबे क़ुरआन) का इन्कार

'ज़िक्र' से मुराद क़ुरआन मजीद भी है और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ात-ए-बाबरकत भी। क़ुरआन का इन्कार या हुज़ूर ﷺ की नबुव्वत व सिफ़ात का इन्कार करने वाले हमेशा के घाटे और हलाकत में मुब्तिला हैं।

[111] हुज्जत तमाम होने के बाद इन्कार

जब कलाम-ए-इलाही और नबी-ए-रहमत दुनिया में तशरीफ़ ले आए और हक़ पूरी तरह रौशन हो गया, तो अब किसी के पास इन्कार का कोई उज़्र बाक़ी नहीं रहा।

[112] क़ुरआन की अज़मत और ग़लबा

क़ुरआन मजीद 'किताबुन अज़ीज़' यानी इंतिहाई बा-इज़्ज़त, बेमिसाल और ग़ालिब किताब है। इसकी तिलावत, इसके अल्फ़ाज़, इसके नुस्ख़े और इसके हाफ़िज़ व आलिम सब अल्लाह की बारगाह में बा-इज़्ज़त और मुअज़्ज़ज़ हैं। दुनिया की कोई ताक़त इस किताब को न मिटा सकती है और न इस पर ग़ालिब आ सकती है।

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