कुरान - 41:47 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

47
۞إِلَيۡهِ يُرَدُّ عِلۡمُ ٱلسَّاعَةِۚ وَمَا تَخۡرُجُ مِن ثَمَرَٰتٖ مِّنۡ أَكۡمَامِهَا وَمَا تَحۡمِلُ مِنۡ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلۡمِهِۦۚ وَيَوۡمَ يُنَادِيهِمۡ أَيۡنَ شُرَكَآءِي قَالُوٓاْ ءَاذَنَّـٰكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٖ

Transliteration: (Ilaihi yuraddu 'ilmus Saaa'ah; wa maa takhruju min samaraatim min akmaamihaa wa maa tahmilu min unsaa wa laa tada'u illaa bi'ilmih; wa Yawma yunaadeehim aina shurakaaa'ee qaalooo aazannaaka maa minnaa min shaheed)

क़ियामत का इल्म उसी की तरफ़ लौटाया जाता है [129]; और कोई फल अपने गाभों से नहीं निकलता और कोई मादा न हामिला होती है और न बच्चा जनती है मगर उसके इल्म के साथ [130]; और जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा: कहां हैं मेरे शरीक [131]? वे कहेंगे: हमने तुझे बता दिया कि हममें से कोई इस पर गवाह नहीं [132]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 47 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 47

क़ियामत का इल्म उसी की तरफ़ लौटाया जाता है [129]; और कोई फल अपने गाभों से नहीं निकलता और कोई मादा न हामिला होती है और न बच्चा जनती है मगर उसके इल्म के साथ [130]; और जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा: कहां हैं मेरे शरीक [131]? वे कहेंगे: हमने तुझे बता दिया कि हममें से कोई इस पर गवाह नहीं [132]!

[129] क़यामत के मुअय्यन वक़्त का ज़ाती इल्म

क़यामत किस साल और किस मुअय्यन लम्हे में आएगी, इसका ज़ाती इल्म अल्लाह तआला ही के पास है। अगरचे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को क़यामत की तमाम निशानियां, दिन (जुमा) और तारीख़ (दसवीं मुहर्रम) का इल्म अता फ़रमाया गया, मगर साल को मख़्फ़ी रखना हिकमत-ए-इलाही का तक़ाज़ा था। (तफ़सीर रूहुल बयान)

[130] कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे का मुहीत इल्म

दरख़्तों की कलियों से निकलने वाले हर फल की तादाद, हर औरत और मादा के हमल, बच्चे की जिंस, उसकी उम्र और उसके रिज़्क़ का कामिल इल्म अल्लाह तआला को अज़ल से है। कायनात की कोई जुज़इयात उसके इल्म से बाहर नहीं।

[131] मैदान-ए-हश्र में मुशरिकों से डांट-डपट

अल्लाह तआला मुशरिक़ीन को रुसवा करने के लिए पूछेगा कि कहां हैं वे बुत और झूठे माबूद जिन्हें तुम मेरा शरीक ठहराते थे? आज वे तुम्हारी मदद क्यों नहीं करते!

[132] झूठे माबूदों से मुशरिकों की बेज़ारी

मुशरिक़ीन बेबस होकर अर्ज़ करेंगे कि आज हममें से कोई भी उनकी ख़ुदाई की गवाही देने वाला नहीं है; सब बुत बातिल और बेअसर साबित हुए।

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