कुरान - 41:49 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

49
لَّا يَسۡـَٔمُ ٱلۡإِنسَٰنُ مِن دُعَآءِ ٱلۡخَيۡرِ وَإِن مَّسَّهُ ٱلشَّرُّ فَيَـُٔوسٞ قَنُوطٞ

Transliteration: (Laa yas'amul insaanu min du'aaa'il khairi wa im massa hush sharru fa ya'oosun qanoot)

इंसान भलाई (दौलत व राहत) मांगने से नहीं थकता [135], और अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाए, तो वह निहायत ना-उम्मीद, बे-आसरा हो जाता है [136]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 49 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 49

इंसान भलाई (दौलत व राहत) मांगने से नहीं थकता [135], और अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाए, तो वह निहायत ना-उम्मीद, बे-आसरा हो जाता है [136]!

[135] दुनियावी फ़ायदे और दौलत की बे-इंतिहा हिर्स

यहां 'इंसान' से मुराद काफ़िर या ग़ाफ़िल इंसान है जो दुनियावी नेअमतों, सेहत और माल व दौलत की तलब में कभी नहीं थकता और उसकी हिर्स कभी ख़त्म नहीं होती। मोमिन दुनियावी माल पर नहीं बल्कि रब की रज़ा पर मुतमइन रहता है।

[136] मुसीबत के वक़्त मायूसी और सब्र का फ़ुक़दान

काफ़िर पर जब कोई आज़माइश, बीमारी या तंगदस्ती आती है, तो वह फ़ौरन मायूस होकर हौसला हार बैठता है क्योंकि उसके पास ईमान और सब्र का सहारा नहीं होता। इसके बरअक्स सच्चा मोमिन मुसीबत में भी अल्लाह की रहमत से कभी ना-उम्मीद नहीं होता।

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