कुरान - 41:7 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ كَٰفِرُونَ

Transliteration: (Allazeena laa yu'toonaz Zakaata wa hum bil-Aakhiratihum kaafiroon)

जो ज़कात अदा नहीं करते [15] और वे ही आख़िरत का इन्कार करने वाले हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 7

जो ज़कात अदा नहीं करते [15] और वे ही आख़िरत का इन्कार करने वाले हैं।

[15] मक्की दौर में ज़कात से मुराद

यह सूरत मक्की है और ज़कात की शरई फ़र्ज़ियत तफ़सील के साथ मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुई। मुफ़स्सिरीन ने इसके दो मफ़हूम बयान फ़रमाए हैं:

  1. रूहानी पाकीज़गी (ईमान): यहां ज़कात से मुराद नफ़्स व रूह की तहारत यानी ईमान लाना है, क्योंकि कुफ़्र सबसे बड़ी नजासत है। मुशरिक़ीन ईमान न लाकर अपने नफ़्स को पाक करने से इंकार करते थे।
  2. आने वाले हुक्म का इन्कार: यह पेशीनगोई थी कि जब ज़कात का हुक्म आएगा, तो ये मुनकिरीन उसे क़बूल नहीं करेंगे और उसका इन्कार करेंगे।

साथ ही आख़िरत का इन्कार उनके तमाम गुनाहों और सरकशी की असल जड़ है, क्योंकि जिसे जज़ा व सज़ा का डर न हो वह हर बदअमली में बेख़ौफ़ हो जाता है।

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