कुरान - 41:6 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

6
قُلۡ إِنَّمَآ أَنَا۠ بَشَرٞ مِّثۡلُكُمۡ يُوحَىٰٓ إِلَيَّ أَنَّمَآ إِلَٰهُكُمۡ إِلَٰهٞ وَٰحِدٞ فَٱسۡتَقِيمُوٓاْ إِلَيۡهِ وَٱسۡتَغۡفِرُوهُۗ وَوَيۡلٞ لِّلۡمُشۡرِكِينَ

Transliteration: (Qul innamaaa ana basharum mislukum yoohaaa ilaiya annamaaa ilaahukum Ilaahunw Waahidun fastaqeemooo ilaihi wastaghfirooh; wa wailul lil mushrikeen)

आप फ़रमा दीजिए [9]: मैं तो बस तुम्हारी तरह का एक इंसान हूं [10], मेरी तरफ़ वही भेजी जाती है कि तुम्हारा माबूद सिर्फ़ एक ही माबूद है [11]; पस सीधे उसी की तरफ़ रुख़ रखो [12] और उसी से बख़्शिश चाहो [13]; और बर्बादी है मुशरिकों के लिए [14], (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 6

आप फ़रमा दीजिए [9]: मैं तो बस तुम्हारी तरह का एक इंसान हूं [10], मेरी तरफ़ वही भेजी जाती है कि तुम्हारा माबूद सिर्फ़ एक ही माबूद है [11]; पस सीधे उसी की तरफ़ रुख़ रखो [12] और उसी से बख़्शिश चाहो [13]; और बर्बादी है मुशरिकों के लिए [14],

[9] नबी करीम ﷺ को कलाम का हुक्म

लफ़्ज़ 'फ़रमा दीजिए' (क़ुल) अल्लाह तआला का हुक्म है। अल्लाह तआला ही को यह ज़ेब देता है कि वह अपने महबूब को इस तरह का हुक्म फ़रमाए। उम्मत को यह हक़ नहीं कि वह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आम इंसानों की तरह समझे या पुकारे, जैसा कि सूरह नूर में फ़रमाया गया: "रसूल के पुकारने को आपस में ऐसा न ठहरा लो जैसा तुम में एक दूसरे को पुकारता है।"

[10] बशरीयत-ए-मुबारका और हुज़ूर ﷺ की तवाज़ो

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमाना कि "मैं तुम्हारी तरह बशर हूं" आपकी कमाल-ए-तवाज़ो और आजीज़ी का इज़हार है, यानी मैं ख़ुदा या ख़ुदा का बेटा नहीं बल्कि अल्लाह का सच्चा बंदा और रसूल हूं। इससे आपकी रिसालत, मर्तबा-ए-विलायत और शफ़ाअत की नफ़ी हरगिज़ नहीं होती।

[11] वही-ए-इलाही: अज़मत और इम्तियाज़ की बुनियाद

हुज़ूर ﷺ और आम इंसानों में बुनियादी फ़र्क़ वही-ए-इलाही है। जिस तरह इंसान और हैवान में अक़्ल व गोयाई का फ़र्क़ है, उसी तरह नबी और उम्मती में वही-ए-इलाही और इस्मत व नबुव्वत का बेपायां फ़र्क़ है। हमारा तौहीद का इल्म अंबिया के वास्ते से है जबकि अंबिया का इल्म बराहे-रास्त अल्लाह तआला की अता से है।

[12] सिरात-ए-मुस्तक़ीम पर इस्तक़ामत

यानी सच्चे अक़ाइद अपनाओ और नेक आमाल पर साबित-क़दम रहो जो तुम्हें अल्लाह तआला की रज़ा और कुर्ब तक पहुंचा दें।

[13] इस्तिग़फ़ार का हुक्म

काफ़िरों को कुफ़्र से तौबा करने का हुक्म है, गुनहगारों को गुनाहों से इस्तिग़फ़ार का, और नेककारों को यह हुक्म है कि वे अपनी इबादतों पर घमंड न करें बल्कि अल्लाह के हुज़ूर आजीज़ी से अर्ज़ करें कि हमारी इबादतें तेरी बारगाह के लायक़ नहीं, तू अपने फ़ज़्ल से क़बूल फ़रमा ले।

[14] शिर्क और कुफ़्र की हलाकत

मुशरिक़ीन और तमाम मुनकिरीन-ए-हक़ के लिए दुनिया व आख़िरत में हलाकत और दर्दनाक अज़ाब की वईद है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now