कुरान - 41:4 सूरह फुस्सिलात अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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بَشِيرٗا وَنَذِيرٗا فَأَعۡرَضَ أَكۡثَرُهُمۡ فَهُمۡ لَا يَسۡمَعُونَ

Transliteration: (Basheeranw wa nazeeran fa-a'rada aksaruhum fahum laa yasma'oon)

ख़ुशख़बरी सुनाने वाला [4] और डर सुनाने वाला; फिर भी उनमें से अक्सर लोगों ने मुंह फेर लिया, पस वे सुनते ही नहीं [5]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह फुस्सिलात आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह फ़ुस्सिलत (हा-मीम अस-सजदा) तफ़सीर - आयत 4

ख़ुशख़बरी सुनाने वाला [4] और डर सुनाने वाला; फिर भी उनमें से अक्सर लोगों ने मुंह फेर लिया, पस वे सुनते ही नहीं [5]।

[4] क़ुरआन की हक़ीक़त और तिलावत के अहकाम

क़ुरआन करीम सिर्फ़ वही अरबी इबारत है जो अल्लाह तआला ने नाज़िल फ़रमाई। इसका कोई तर्जुमा हक़ीक़ी क़ुरआन नहीं कहला सकता। इसी बिना पर:

  • नमाज़ में क़ुरआन के तर्जुमे की तिलावत दुरुस्त नहीं।
  • सजदा-ए-तिलावत और तिलावत-ए-क़ुरआन के मख़्सूस अहकाम सिर्फ़ अरबी कलाम पर लागू होते हैं।
  • क़ुरआन करीम पूरी इंसानियत के लिए हिदायत और बशीर व नज़ीर है, जो ईमान वालों को जन्नत की बशारत देता है और मुनकिरीन को दोज़ख़ के अज़ाब से डराता है।

[5] हक़ को तवज्जोह से सुनने की अहमियत

यहां 'सुनने' से मुराद क़बूल करने और दिल की तवज्जोह से सुनना है। जब मुशरिक़ीन ने हक़ को क़बूल करने की नीयत से सुनने से इंकार कर दिया, तो फ़रमाया गया कि वे सुनते ही नहीं। इससे यह मसला भी साबित होता है कि क़ुरआन करीम की तिलावत के वक़्त ख़ामोश रहना और अदब से सुनना लाज़िम और वाजिब है।

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