कुरान - 40:39 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
يَٰقَوۡمِ إِنَّمَا هَٰذِهِ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَا مَتَٰعٞ وَإِنَّ ٱلۡأٓخِرَةَ هِيَ دَارُ ٱلۡقَرَارِ

Transliteration: (Yaa qawmi innamaa haazihil hayaatud dunyaa mataa'unw wa innal Aakhirata hiya daarul qaraar)

'ऐ मेरी क़ौम! यह दुनिया की ज़िंदगी तो बस चन्द रोज़ा फ़ायदा उठाना है [106], और बेशक आख़िरत ही हमेशा क़ायम रहने का घर है [107] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 39

"'ऐ मेरी क़ौम! यह दुनिया की ज़िंदगी तो बस चन्द रोज़ा फ़ायदा उठाना है [106], और बेशक आख़िरत ही हमेशा क़ायम रहने का घर है [107] ।'"

[106] दुनिया की फ़ानी लज़्ज़तें

दुनिया की दौलत, हुकूमत और ऐश-ओ-आराम बहुत आरज़ी और चन्द रोज़ा हैं। यह महज़ मुसाफ़िरख़ाना है जहाँ इंसान को इम्तिहान के लिए भेजा गया है।

[107] दारुल-क़रार (आख़िरत का दायमी घर)

आख़िरत ही इंसान का अस्ल और हमेशा रहने वाला घर है जहाँ कभी ज़वाल नहीं आएगा। अक़्लमंद वह है जो फ़ानी दुनिया के बदले दायमी आख़िरत को संवारे।

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