कुरान - 40:85 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

85
فَلَمۡ يَكُ يَنفَعُهُمۡ إِيمَٰنُهُمۡ لَمَّا رَأَوۡاْ بَأۡسَنَاۖ سُنَّتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِي قَدۡ خَلَتۡ فِي عِبَادِهِۦۖ وَخَسِرَ هُنَالِكَ ٱلۡكَٰفِرُونَ

Transliteration: (Falam yaku yanfa 'uhum eemaanuhum lammaa ra-aw ba'sana sunnatal laahil latee qad khalat fee 'ibaadihee wa khasira hunaalikal kaafiroon (section 9))

लेकिन उनका ईमान उन्हें कुछ नफ़ा न दे सका जब उन्होंने हमारा अज़ाब देख लिया था [214]; यह अल्लाह का दस्तूर है जो उसके बंदों में जारी रहा है [215], और वहाँ काफ़िर ख़सारे (नुक़सान) में पड़ गए। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 85 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 85

"लेकिन उनका ईमान उन्हें कुछ नफ़ा न दे सका जब उन्होंने हमारा अज़ाब देख लिया था [214]; यह अल्लाह का दस्तूर है जो उसके बंदों में जारी रहा है [215], और वहाँ काफ़िर ख़सारे (नुक़सान) में पड़ गए।"

[214] सुन्नत-ए-इलाही—ईमान बिल-ग़ैब की शर्त

अल्लाह तआला का यह मुस्तक़िल क़ानून है कि इम्तिहान का वक़्त ख़त्म होने और अज़ाब या मौत के फ़रिश्ते को देख लेने के बाद किसी का ईमान या तौबा क़बूल नहीं होती। हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की क़ौम ने अज़ाब की निशानियां देखकर अज़ाब आने से पहले तौबा कर ली थी इसलिए उनकी तौबा क़बूल हुई।

[215] काफ़िरों का मुकम्मल ख़सारा

अज़ाब के आते ही काफ़िरों की तमाम उम्मीदें ख़त्म हो गईं और वे दुनिया और आख़िरत दोनों में हमेशा के लिए हलाक व ख़सारा नसीब हो गए।

अलहम्दु लिल्लाह! सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) का तर्जुमा व तफ़सीर मुकम्मल हुआ।

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