कुरान - 40:83 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

83
فَلَمَّا جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَرِحُواْ بِمَا عِندَهُم مِّنَ ٱلۡعِلۡمِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُواْ بِهِۦ يَسۡتَهۡزِءُونَ

Transliteration: (Falammaa jaaa'at hum Rusuluhum bilbaiyinaati farihoo bimaa 'indahum minal 'ilmi wa haaqa bihim maa kaanoo bihee yastahzi'oon)

फिर जब उनके पास उनके रसूल रोशन दलाइल लेकर आए तो वे अपने उस इल्म (दानिशमंदी) पर इतराने लगे जो उनके पास था [210] [211], और जिस (अज़ाब) का वे मज़ाक़ उड़ाते थे उसी ने उन्हें आ घेरा [212] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 83 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 83

"फिर जब उनके पास उनके रसूल रोशन दलाइल लेकर आए तो वे अपने उस इल्म (दानिशमंदी) पर इतराने लगे जो उनके पास था [210] [211], और जिस (अज़ाब) का वे मज़ाक़ उड़ाते थे उसी ने उन्हें आ घेरा [212] ।"

[210] वह्य-ए-इलाही के मुक़ाबले में अपनी अक़्ल पर नाज़

काफ़िर रसूलों की लाई हुई वह्य और मोजिज़ात के मुक़ाबले में अपने दुनियावी फ़लसफ़ों, तिजारती तजुर्बों और अक़्ल पर घमंड करते थे और नबियों की तालीमात को दक़ियानूसी समझकर मज़ाक़ उड़ाते थे।

[211] दुनियावी इल्म का तकब्बुर

दुनियावी इल्म व हुनर अगर दीन और वह्य-ए-इलाही के ताबे न हो तो वह इंसान को गुमराह और मुतकब्बिर बना देता है।

[212] जिस अज़ाब का मज़ाक़ उड़ाया वही मुसल्लत हुआ

वे जिस अज़ाब को नामुमकिन समझकर हँसते थे, वही अज़ाब अचानक उन पर आ पड़ा और उन्हें तबाह कर गया।

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