कुरान - 40:67 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
هُوَ ٱلَّذِي خَلَقَكُم مِّن تُرَابٖ ثُمَّ مِن نُّطۡفَةٖ ثُمَّ مِنۡ عَلَقَةٖ ثُمَّ يُخۡرِجُكُمۡ طِفۡلٗا ثُمَّ لِتَبۡلُغُوٓاْ أَشُدَّكُمۡ ثُمَّ لِتَكُونُواْ شُيُوخٗاۚ وَمِنكُم مَّن يُتَوَفَّىٰ مِن قَبۡلُۖ وَلِتَبۡلُغُوٓاْ أَجَلٗا مُّسَمّٗى وَلَعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Huwal lazee khalaqakum min turaabin summa min nutfatin summa min 'alaqatin summa yukhrijukum tiflan summa litablughooo ashuddakum summa litakoonoo shuyookhaa; wa minkum mai yutawaffaa min qablu wa litablughooo ajalam musam manw-wa la'allakum ta'qiloon)

वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर नुत्फ़े (बूँद) से [172], फिर ख़ून के लोथड़े से [173], फिर तुम्हें बच्चे की सूरत में निकालता है [174], फिर तुम्हें बाक़ी रखता है ताकि तुम अपनी पूरी जवानी को पहुँचो [175], फिर ताकि तुम बूढ़े हो जाओ [176], और तुम में से कोई पहले ही वफ़ात पा जाता है [177], और ताकि तुम मुक़र्रर मुद्दत तक पहुँच जाओ [178] और ताकि तुम अक़्ल से काम लो [179] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 67

"वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर नुत्फ़े (बूँद) से [172], फिर ख़ून के लोथड़े से [173], फिर तुम्हें बच्चे की सूरत में निकालता है [174], फिर तुम्हें बाक़ी रखता है ताकि तुम अपनी पूरी जवानी को पहुँचो [175], फिर ताकि तुम बूढ़े हो जाओ [176], और तुम में से कोई पहले ही वफ़ात पा जाता है [177], और ताकि तुम मुक़र्रर मुद्दत तक पहुँच जाओ [178] और ताकि तुम अक़्ल से काम लो [179] ।"

[172] मिट्टी और नुत्फ़ा से तख़लीक़ की इब्तिदा

इंसान की असल हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तख़लीक़ मिट्टी से हुई, और फिर नसल-ए-इंसानी नुत्फ़े के ज़रिये परवान चढ़ी।

[173] अलाक़ा (ख़ून का लोथड़ा)

रहम-ए-मादर में नुत्फ़ा जमकर ख़ून का लोथड़ा बनता है, फिर गोश्त की बोटी और फिर हड्डियाँ और आज़ा बनते हैं।

[174] तिफ़्ल—कमज़ोर बच्चे की पैदाइश

बच्चा दुनिया में निहायत बेबस और कमज़ोर पैदा होता है जिसे हर लम्हा मां-बाप और अल्लाह की रहमत की ज़रूरत होती है।

[175] अशद्—जवानी और क़ुव्वत

फिर वह जवानी और कमाल-ए-क़ुव्वत को पहुँचता है जहाँ अक़्ल व ताक़त उरूज पर होती है।

[176] बुढ़ापा और ज़ोफ़

फिर क़ुव्वत ढलने लगती है और बुढ़ापा आ घेरता है।

[177] बचपन या जवानी में मौत

हर शख़्स बुढ़ापे तक नहीं पहुँचता, बहुत से बचपन या जवानी ही में वफ़ात पा जाते हैं।

[178] मुक़र्रर मुद्दत (अजल-ए-मुसम्मा)

हर जान के लिए अल्लाह के यहाँ एक मुक़र्रर वक़्त लिखा हुआ है जिससे एक लम्हा आगे-पीछे नहीं हो सकता।

[179] अक़्ल व मारफ़त की दावत

तख़लीक़ के इन तमाम मराहिल पर ग़ौर करने वाला कभी अल्लाह की वहदानियत और दोबारा जी उठने का इनकार नहीं कर सकता।

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