कुरान - 40:7 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
ٱلَّذِينَ يَحۡمِلُونَ ٱلۡعَرۡشَ وَمَنۡ حَوۡلَهُۥ يُسَبِّحُونَ بِحَمۡدِ رَبِّهِمۡ وَيُؤۡمِنُونَ بِهِۦ وَيَسۡتَغۡفِرُونَ لِلَّذِينَ ءَامَنُواْۖ رَبَّنَا وَسِعۡتَ كُلَّ شَيۡءٖ رَّحۡمَةٗ وَعِلۡمٗا فَٱغۡفِرۡ لِلَّذِينَ تَابُواْ وَٱتَّبَعُواْ سَبِيلَكَ وَقِهِمۡ عَذَابَ ٱلۡجَحِيمِ

Transliteration: (Allazeena yahmiloonal 'Arsha wa man hawlahoo yusabbihoona bihamdi Rabbihim wa yu'minoona bihee wa yastaghfiroona lillazeena aamanoo Rabbanaa wasi'ta kulla shai'ir rahmatanw wa 'ilman faghfir lillazeena taaboo wattaba'oo sabeelaka wa qihim 'azaabal Jaheem)

वे (फ़रिश्ते) जो अर्श को उठाए हुए हैं [16] और जो उसके गिर्द हैं [17], अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते हैं [18] और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों की मग़फ़िरत की दुआ मांगते हैं [19] कि: 'ऐ हमारे रब! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है [20], तो उन्हें बख़्श दे जिन्होंने तौबा की [21] और तेरे रास्ते की पैरवी की [22], और उन्हें दोज़ख़ के अज़ाब से बचा ले।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 7

"वे (फ़रिश्ते) जो अर्श को उठाए हुए हैं [16] और जो उसके गिर्द हैं [17], अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते हैं [18] और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों की मग़फ़िरत की दुआ मांगते हैं [19] कि: 'ऐ हमारे रब! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है [20], तो उन्हें बख़्श दे जिन्होंने तौबा की [21] और तेरे रास्ते की पैरवी की [22], और उन्हें दोज़ख़ के अज़ाब से बचा ले।'"

[16] हमलातुल-अर्श (अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते)

मौजूदा वक़्त में अर्श-ए-इलाही को चार (4) मुक़र्रब तरीन अज़ीम फ़रिश्ते उठाए हुए हैं, और क़ियामत के दिन उनकी तादाद आठ (8) होगी जैसा कि सूरह अल-हाक़्क़ा (आयत 17) में बयान फ़रमाया गया।

[17] अर्श के गिर्द तवाफ़ करने वाले करूबिय्यीन

अर्श-ए-इलाही के गिर्द अनगिनत मुक़र्रब फ़रिश्ते हैं जिन्हें 'करूबिय्यीन' कहा जाता है। वे हर लम्हा अर्श का तवाफ़ करते और हम्द व सना में मशग़ूल रहते हैं।

[18] हम्द व तस्बीह—दुआ का अदब

फ़रिश्ते पहले अल्लाह की पाकी और हम्द बयान करते हैं, जिससे यह अदब मालूम हुआ कि दुआ मांगने से पहले अल्लाह की तारीफ़ व तस्बीह बयान करनी चाहिए।

[19] मोमिनीन के लिए फ़रिश्तों की शफ़ाअत व इस्तिग़फ़ार

मुक़र्रब फ़रिश्ते अहले ईमान के लिए मग़फ़िरत व बख़्शिश की दुआ मांगते हैं। इससे साबित हुआ कि फ़रिश्तों की शफ़ाअत और नेक बंदों का दूसरों के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत करना बारगाह-ए-इलाही में निहायत मक़बूल अमल है।

[20] वुसअत-ए-रहमत व इल्म

अल्लाह की रहमत और उसका इल्म कायनात के हर ज़र्रे पर मुहीत है।

[21] तौबा करने वालों की बख़्शिश

फ़रिश्ते बिलख़ुसूस उन लोगों के लिए दुआ करते हैं जिन्होंने गुनाहों से सच्ची तौबा की।

[22] शरीअत की पैरवी और दोज़ख़ से नजात

सच्ची तौबा के साथ-साथ हुज़ूर ﷺ के लाए हुए सीधे रास्ते (शरीअत) पर चलना ही दोज़ख़ से नजात की ज़मानत है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now