कुरान - 11:27 सूरह हूद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

27
فَقَالَ ٱلۡمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن قَوۡمِهِۦ مَا نَرَىٰكَ إِلَّا بَشَرٗا مِّثۡلَنَا وَمَا نَرَىٰكَ ٱتَّبَعَكَ إِلَّا ٱلَّذِينَ هُمۡ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ ٱلرَّأۡيِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمۡ عَلَيۡنَا مِن فَضۡلِۭ بَلۡ نَظُنُّكُمۡ كَٰذِبِينَ

Transliteration: (Faqaalal mala ul lazeena kafaroo min qawmihee ma naraaka illaa basharam mislanaa wa maa naraakat taba'aka illal lazeena hum araazilunaa baadiyar raayi wa maa naraa lakum 'alainaa min fadlim bal nazunnukum kaazibeen)

तो उनकी क़ौम के काफ़िर सरदारों ने कहा, 'हम तो तुम्हें अपने जैसा एक इंसान ही देखते हैं [59], और हम देखते हैं कि तुम्हारी पैरवी सिर्फ़ हमारे कम-अक़्ल और निचले दर्जे के लोगों ने बिना सोचे-समझे की है [60], और हम अपने ऊपर तुम्हारी कोई फ़ज़ीलत नहीं देखते, बल्कि हम तो तुम्हें झूठा समझते हैं [61]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह हूद आयत 27 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा हूद – आयत 27 की तफ़्सीर

✅ [59] नबी की बशरीयत की आड़ में इनकार

मुशरिकीन का पहला एतिराज़ यह था कि आप हमारी तरह हाड़-मांस के इंसान हैं, तो हम आपकी पैरवी क्यों करें? वे जिहालत की वजह से यह न समझ सके कि अल्लाह की तरफ़ से मक़ामे नुबुव्वत इंसानों की रहनुमाई के लिए अज़ीम नेअमत है।

✅ [60] मोमिनीन और ग़रीबों की तौहीन

काफ़िरों ने नूह (अलै.) के सच्चे पैरोकारों को कमज़ोर और ग़रीब कहकर हक़ीर जाना। तकब्बुर का यह हमेशा से तरीक़ा रहा है कि वे दुनियावी माल व दौलत को बड़ाई का पैमाना समझते हैं।

✅ [61] हक़ का इनकार और झूठा इल्ज़ाम

अपनी अना और तकब्बुर के बाइस सरदारों ने नूह (अलै.) और उनके जानिसारों को झुठला दिया और अपनी बड़ाई के नशे में हक़ को क़बूल करने से इनकार कर दिया।

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