कुरान - 11:30 सूरह हूद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
وَيَٰقَوۡمِ مَن يَنصُرُنِي مِنَ ٱللَّهِ إِن طَرَدتُّهُمۡۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ

Transliteration: (Wa yaa qawmi mai yansurunee minal laahi in tarattuhum; afalaa tazak karoon)

और ऐ मेरी क़ौम! अगर मैं उन्हें अपने पास से निकाल दूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में मेरी कौन मदद करेगा [67]? तो क्या तुम ग़ौर नहीं करते? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह हूद आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा हूद – आयत 30 की तफ़्सीर

✅ [67] दो अज़ीम सबक़

१. मोमिनों से मोहब्बत: अम्बिया हमेशा ईमान वालों से चाहे वे कितने भी ग़रीब हों, बेपनाह मोहब्बत और इज़्ज़त का बर्ताव करते हैं; मोमिनों से नफ़रत करना काफ़िरों का शेवा है।

२. कमज़ोरों को दुत्कारने का गुनाह: सच्चे मोमिनों को हक़ीर जानकर मजलिस से निकालना अल्लाह के ग़ज़ब को दावत देना है; अल्लाह अपने नेक बंदों की दिलशिकनी बर्दाश्त नहीं फ़रमाता।

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