Transliteration: (Wa laa aqoolu lakum 'indee khazaa'inul laahi wa laaa a'lamul ghaiba wa laa aqoolu innee malakunw wa laaa aqoolu lillazeena tazdareee a'yunukum lai yu'tiyahumul laahu khairan Allaahu a'lamu bimaa feee anfusihim innee izal laminaz zaalimeen)
नूह (अलै.) ने साफ़ फ़रमाया कि नबी दुनियावी खज़ाने जमा करने या बांटने का दावा नहीं करता; उसका मक़ाम रूहानी रहनुमाई है।
नबी का इल्मे ग़ैब अल्लाह का अता कर्दा होता है, ज़ाती तौर पर मुस्तक़िल इल्मे ग़ैब सिर्फ़ अल्लाह की सिफ़त है।
नबी इंसान ही होता है ताकि इंसान उसके अमली नमूने की पैरवी कर सकें; अगर फ़रिश्ता नबी होता तो लोग कहते कि हम फ़रिश्ते जैसा अमल नहीं कर सकते।
काफ़िर चाहे ग़रीब मोमिनों को हक़ीर समझें, मगर अल्लाह के यहां उनके लिए दुनिया और आख़िरत की अज़ीम भलाइयां मुक़द्दर हैं।
किसी मोमिन के खुलूस पर शक करना या उसे बदगुमानी से हक़ीर जानना ज़ुल्म है; दिलों के भेदों का फ़ैसला सिर्फ़ अल्लाह के सपुर्द है।
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