Transliteration: (Waqsid fee mashyika waghdud min sawtik; inna ankaral aswaati lasawtul hameer (section 2))
"'और अपनी चाल में मियाना-रवी (एअतिदाल) इख़्तियार कर [43], और अपनी आवाज़ को पस्त रख; बेशक तमाम आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधे की आवाज़ है [44]।"
यह आयत चलने में मियाना-रवी (संतुलन) की तरग़ीब देती है—न तो बे-सब्रों की तरह बहुत तेज़ दौड़ना और न ही सुस्तों की तरह पाँव घसीटना। बहुत तेज़ चलना ग़ैर-संजीदगी और बेचैनी को ज़ाहिर कर सकता है, जबकि बहुत भारी और बोझिल चाल तकब्बुर या घमंड की अलामत हो सकती है। इस्लामी तरीक़ा पुर-वक़ार, पुर-सुकून और मुअतदिल चाल है, जो एक संजीदा और बा-वक़ार शख़्सियत की पहचान है।
यह एअतिदाल आजिज़ी का आईनादार है, जो अल्लाह को बेहद महबूब है, और इंसान को घमंडियों या ग़ाफ़िलों की मुशाबहत से महफ़ूज़ रखता है।
अपनी आवाज़ को धीमा रखने का हुक्म बा-अदब और शाइस्ता गुफ़्तगू की अहमियत को वाज़ेह करता है। बग़ैर ज़रूरत के चीख़ कर बोलना जहालत और बे-हिस्सी की अलामत है, और आयत ने इसकी एक हिकमत भरी मिसाल दी है: गधे की आवाज़।
यह तशबीह मज़ाक़ उड़ाने के लिए नहीं बल्कि यह समझाने के लिए है कि चीख़ने वाली और करख़्त आवाज़ सुनने वालों के लिए कितनी नागवार होती है—जिस तरह गधे की ढेंचू-ढेंचू किसी को पसंद नहीं आती। पस, धीमा और मुअतदिल लहज़ा हुस्न-ए-अख़लाक़, ज़ब्त-ए-नफ़्स और दूसरों के एहतराम का सबूत है।
साथ ही, आयत उस आवाज़ में फ़र्क़ करती है जो इख़लास से बुलंद हो—जैसे अल्लाह का ज़िक्र या अज़ान, जिसकी मिसाल मुर्ग़ की बांग से दी गई है, जो फ़रिश्तों को देखकर आवाज़ लगाता है और जिसके वक़्त दुआ क़बूल होती है। इसके बरअक्स, गधा शैतान को देखकर या शहवत से चीख़ता है, जो रूहानी तौर पर नापसंदीदा है। इसलिए आवाज़ में नीयत और मक़ाम बहुत अहमियत रखते हैं।
यह आयत तालीम देती है कि रफ़्तार और गुफ़्तगू दोनों में एअतिदाल इस्लामी अख़लाक़ के बुनियादी अरकान हैं, और तकब्बुर, दिखावे और बद-तहज़ीबी से हर हाल में बचना चाहिए।
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