कुरान - 31:21 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُواْ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُواْ بَلۡ نَتَّبِعُ مَا وَجَدۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ٱلشَّيۡطَٰنُ يَدۡعُوهُمۡ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ

Transliteration: (Wa izaa qeela lahumut-tabi'oo maaa anzalal laahu qaaloo bal nattabi'u maa wajadnaa 'alaihi aabaaa'anaa; awalaw kaanash Shaitaanu yad'oohum ilaa 'azaabis sa'eer)

और जब उनसे कहा जाता है कि 'उसकी पैरवी करो जो अल्लाह ने नाज़िल फ़रमाया है [47],' तो कहते हैं, 'बल्कि हम तो उसकी पैरवी करेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया [48];' क्या अगरचे शैतान उन्हें भड़कती आग के अज़ाब की तरफ़ बुला रहा हो तब भी [49]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 21

"और जब उनसे कहा जाता है कि 'उसकी पैरवी करो जो अल्लाह ने नाज़िल फ़रमाया है [47],' तो कहते हैं, 'बल्कि हम तो उसकी पैरवी करेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया [48];' क्या अगरचे शैतान उन्हें भड़कती आग के अज़ाब की तरफ़ बुला रहा हो तब भी [49]?"

[47] वही-ए-इलाही की पैरवी

यह हुक्म उसकी पैरवी को लाज़िम करता है जो अल्लाह ने नाज़िल फ़रमाया, जिसमें क़ुरआन-ए-पाक और हदीस-ए-मुबारका दोनों शामिल हैं। क़ुरआन अपने अलफ़ाज़ और मफ़हूम के साथ अल्लाह की सीधी वही है, और हदीस—अगरचे हुज़ूर ﷺ के मुबारका अलफ़ाज़ में है—उस इलाही हिदायत का इज़हार है जो आपके मुक़द्दस दिल व दिमाग़ में उतारी गई थी।

पस, वही-ए-इलाही सिर्फ़ एक ज़रिया तक महदूद नहीं, और हक़ के रास्ते पर क़ायम रहने के लिए किताबुल्लाह और सुन्नत-ए-रसूलुल्लाह दोनों की पैरवी लाज़िमी है।

[48] आबा-ओ-अजदाद की अंधी तक़्लीद

यह हिस्सा उन लोगों की मज़म्मत करता है जो वही की पैरवी के मुक़ाबले में अपने बाप-दादा की रस्मों की अंधी तक़्लीद पर अड़े रहते हैं, चाहे वे रस्में शरीअत के ख़िलाफ़ ही क्यों न हों। यह काफ़िरों का तरीक़ा है जो हक़ के मुक़ाबले में ख़ानदानी रस्मों को तरजीह देते हैं।

ताहम, यह आयत इस्लामी शरीअत में फ़ुक़हा-ए-किराम की तक़्लीद को बिल्कुल रद्द नहीं करती। बल्कि यह साफ़ फ़र्क़ करती है:

  • जहालत भरी रस्मों की पैरवी जो वही के ख़िलाफ़ हों (मज़मूम व हराम है), और

  • सालेहीन और सच्चे बुज़ुर्गों के रास्ते की पैरवी (पसंदीदा व लाज़िम है), जैसा कि फ़रमाया गया: “और सच्चों के साथ हो जाओ” (सूरह अत-तौबा, 9:119)।

इसलिए हक़्क़ानी उलेमा की पैरवी करना इबादत है, जबकि गुमराह बाप-दादा की अंधी पैरवी करना जहालत है।

[49] शैतान की पैरवी की हक़ीक़त

आयत का इख़्तिताम इस सख़्त चेतावनी पर होता है: उन गुमराह बाप-दादा को जहन्नम की राह दिखाने वाला ख़ुद शैतान था। लिहाज़ा आज उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलना दरअसल शैतान की इताअत करना है, बावजूद इसके कि नबुव्वत का रौशन नूर और इलाही हिदायत सामने मौजूद है।

यह याद दिलाता है कि:

  • बुरे लोगों या गुमराहाना रस्मों की पैरवी शैतान की पैरवी के बराबर है,

  • तमाम रिवायतों को शरीअत की कसौटी पर परखना लाज़िम है, और

  • हक़ीक़ी कामयाबी वही-ए-इलाही की पैरवी में है, न कि महज़ विरासत में मिली रस्मों में।

यह आयत एक दावत है कि रवायती जकड़बन्दी को तोड़ा जाए, नाज़िल-शुदा हक़ को अपनाया जाए, और यह समझा जाए कि हर विरासत में मिली रस्म मुक़द्दस नहीं होती—ख़ास तौर पर जब वह अल्लाह के रास्ते से भटकाने वाली हो।

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