कुरान - 31:22 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

22
۞وَمَن يُسۡلِمۡ وَجۡهَهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ وَهُوَ مُحۡسِنٞ فَقَدِ ٱسۡتَمۡسَكَ بِٱلۡعُرۡوَةِ ٱلۡوُثۡقَىٰۗ وَإِلَى ٱللَّهِ عَٰقِبَةُ ٱلۡأُمُورِ

Transliteration: (Wa many yuslim wajha hooo ilal laahi wa huwa muhsinun faqadistamsaka bil'ur watil wusqaa; wa ilal laahi 'aaqibatul umoor)

और जो कोई अपना चेहरा अल्लाह के हुज़ूर झुका दे (फ़रमांबरदार हो जाए) और वह नेकोकार (मुहसिन) भी हो [50], तो यक़ीनन उसने एक बहुत मज़बूत कड़ा थाम लिया [51]; और तमाम कामों का अंजाम अल्लाह ही की तरफ़ है [52]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 22 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 22

"और जो कोई अपना चेहरा अल्लाह के हुज़ूर झुका दे (फ़रमांबरदार हो जाए) और वह नेकोकार (मुहसिन) भी हो [50], तो यक़ीनन उसने एक बहुत मज़बूत कड़ा थाम लिया [51]; और तमाम कामों का अंजाम अल्लाह ही की तरफ़ है [52]।"

[50] इताअत और एहसान का हक़ीक़ी मफ़हूम

यह आयत उस शख़्स की तारीफ़ फ़रमाती है जो अपना रुख़ अल्लाह के सामने झुका देता है—जो इबादत में कामिल इताअत, इख़्लास और आजिज़ी का इस्तिआरा है। यहाँ "इस्लाम" से मुराद ज़ाहिरी इबादत है, जबकि "एहसान" से मुराद उन आमाल को कामिल ईमान और हुज़ूरी-ए-क़ल्ब के साथ बजा लाना है। एक दूसरी तफ़सीर यह है:

  • इस्लाम: अल्लाह पर ईमान

  • एहसान: हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की रिसालत पर पुख़्ता ईमान

पस, कामिल इताअत में अल्लाह को रब मानना और हुज़ूर ख़ातमुन नबिय्यीन ﷺ को तस्लीम करना दोनों शामिल हैं। महज़ अल्लाह को मानना और रसूल ﷺ का इंकार करना ईमान को बातिल कर देता है। यह इस्लाम की रूह यानी अक़ीदे और अमल की यकजहती को साबित करता है।

[51] मज़बूत कड़ा थामना

“मज़बूत कड़ा थामने” का मुहावरा पुख़्ता और अटूट ईमान का इस्तिआरा है। सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं कि यह मज़बूत कड़ा हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की ज़ात-ए-मुबारका है, जो हबलुल्लाह (अल्लाह की रस्सी) हैं जो इंसान को रूहानी पस्ती से निकालकर बुलंदी पर पहुँचाती है—जैसे कुएं से रस्सी के सहारे डोल निकाला जाता है।

जो शख़्स सुन्नत और सीरत-ए-रसूल ﷺ को मज़बूती से पकड़ता है वह गुमराही की उलझनों से बचकर कामरान होता है। हुज़ूर ﷺ से जुड़ना दरअसल इलाही रहमत से जुड़ना और ईमान पर साबित-क़दम रहना है।

[52] अंजाम सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है

आयत का इख़्तिताम इस यक़ीन पर होता है कि तमाम मुआम्लात का आख़िरी फ़ैसला अल्लाह ही की तरफ़ है—चाहे वह हिसाब हो, जज़ा हो या सज़ा। इसका मतलब है:

  • मुतलक़ हुकूमत अल्लाह की है, न कि दुनियावी ताक़तों की

  • हर अमल उसकी अदालत में पेश होगा

  • मुहासिबा अटल और यक़ीनी है

यह आयत ख़ालिस इताअत, आजिज़ाना फ़रमांबरदारी, और आख़िरी मंज़िल की मुसल्सल याद की तरग़ीब देती है।

ख़ुलासा यह कि यह आयत कामयाबी का रास्ता तय करती है कि अल्लाह पर ख़ालिस ईमान, उसके रसूल पर कामिल अक़ीदा, नेक आमाल, और सुन्नत-ए-नबवी से गहरा तअल्लुक़ क़ायम रखा जाए, और यह हमेशा याद रहे कि हमारा पलटना सिर्फ़ अल्लाह ही की तरफ़ है।

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