Transliteration: (Wa man kafara falaa yahzunka kufruh; ilainaa marji'uhum fanunabbi'uhum bimaa 'amiloo; innal laaha 'aleemum bizaatis sudoor)
"और जो कुफ़्र करे तो उसका कुफ़्र आपको ग़मगीन न करे [53]; हमारी ही तरफ़ उनका पलटना है, फिर हम उन्हें बता देंगे जो कुछ वे करते थे; बेशक अल्लाह सीनों के भेदों को ख़ूब जानता है।"
यह आयत हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ को तसल्ली देती है कि मुनकिरीन के कुफ़्र पर ग़मगीन न हों। आपका काम हक़ का पैग़ाम पहुँचाना था, ज़बरदस्ती मनवाना नहीं। कुफ़्र करने वाले का नुक़सान सिर्फ़ उसी की ज़ात पर है।
जैसा कि क़ुरआन में दूसरी जगह फ़रमाया: “और जहन्नम वालों के बारे में आपसे सवाल नहीं किया जाएगा” (सूरह अल-बक़रह, 2:119)। यह साबित करता है कि जब आपने तबलीग़ का हक़ अदा फ़रमा दिया, तो मुनकिरीन के कुफ़्र की कोई ज़िम्मेदारी आप पर नहीं है।
यह इस बात की भी दलील है कि क़यामत में कोई भी यह उज़्र पेश नहीं कर सकेगा कि हम तक पैग़ाम नहीं पहुँचा—क्योंकि हुज़ूर ﷺ ने पैग़ाम पहुँचाने की ज़िम्मेदारी कामिल तरीक़े से पूरी फ़रमा दी।
काफ़िर आख़िरकार अल्लाह ही की तरफ़ लौटेंगे और उसकी क़ुदरत से भाग नहीं सकेंगे। वहाँ अल्लाह उन्हें उनके तमाम आमाल से पूरी तरह बा-ख़बर करेगा और अदल-ए-कामिल के साथ हिसाब लेगा।
अल्लाह सिर्फ़ उनके ज़ाहिरी आमाल ही नहीं बल्कि सीनों की गहराइयों में छुपी नीयतों, मुनाफ़क़त और तकब्बुर को भी पूरी तरह जानता है। “सीनों के भेद” का ज़िक्र यह वाज़ेह करता है कि कोई भी पोशीदा बात इलाही नज़र से नहीं बच सकती।
पस, यह आयत यह दर्स देती है:
लोगों के कुफ़्र पर हुज़ूर ﷺ का ग़मगीन होना आपकी रहमत की वजह से था, लेकिन यह आपके ऊपर कोई बोझ नहीं होना चाहिए।
हक़ीक़ी मुहासिबा हर फ़र्द की अपनी ज़ात पर है।
अल्लाह का फ़ैसला ज़ाहिरी आमाल और बातिनी हक़ाय़क़ दोनों पर मब्नी है, और कोई भी उसके कामिल इंसाफ़ से बच नहीं सकता।
यह मोमिनीन के लिए दावत है कि वे अपने फ़रीज़े में मुख़्लिस रहें और इस बात पर यक़ीन रखें कि नतीजों का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है।
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