Transliteration: (Wa la'in sa altahum man khalaqas samaawaati wal arda la yaqoolunnal laah; qulil hamdu lillaah; bal aksaruhum laa ya'lamoon)
"और अगर आप उनसे पूछें कि 'आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?' तो वे ज़रूर कहेंगे [57], 'अल्लाह ने!' आप कह दीजिए, 'तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं;' बल्कि उनमें से अक्सर लोग बे-इल्म हैं [58]।"
यह आयत उन काफ़िरों के बारे में है जो अल्लाह तआला के वुजूद को मानते थे। ताहम तमाम काफ़िर ऐसे नहीं थे—मक्का के मुशरिकीन में से कुछ दहरिये (नास्तिक) भी थे जो ख़ुदा के वुजूद के सिरे से मुनकिर थे, जैसा कि फ़रमाया: “वे कहते हैं: हमें तो सिर्फ़ ज़माना ही हलाक करता है” (सूरह अल-जासिया, 45:24)। पस यह आयत दूसरी आयात के ख़िलाफ़ नहीं है।
इससे यह अज़ीम सबक़ मिलता है कि अल्लाह को ख़ालिक़, मालिक और राज़िक़ मानना—यहाँ तक कि उसकी तमाम सिफ़ात का इक़रार करना भी—सच्चे ईमान के लिए काफ़ी नहीं है। इब्लीस भी यह सब मानता था लेकिन फिर भी काफ़िर रहा।
सच्चा ईमान (ईमान-ए-कामिल) यह है कि अल्लाह पर ईमान लाने के साथ-साथ हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की रिसालत को दिल व जान से तस्लीम किया जाए।
अरब के मुशरिक अल्लाह की सिफ़ात के क़ायल थे, लेकिन हुज़ूर ﷺ की नबुव्वत का इंकार करने की वजह से काफ़िर ठहरे।
यह जुमला ज़ाहिर करता है कि उनमें से:
कुछ अल्लाह को मानते हुए भी शिर्क में मुब्तला रहे,
कुछ ने इस्लाम क़बूल कर लिया, और
कुछ लोग हुज़ूर ﷺ के ऐलान-ए-नबुव्वत से पहले भी दीन-ए-हनीफ़ और तौहीद पर क़ायम थे, जैसे हुज़ूर ﷺ के वालिदैन-ए-करीमैन और आबा-ओ-अजदाद।
इसीलिए फ़रमाया “अक्सर”—सब बे-इल्म नहीं थे, लेकिन अकसरियत अपने इक़रार के तक़ाज़ों को पूरा करने में नाकाम रही।
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