Transliteration: (Wa law annamaa fil ardi min shajaratin aqlaamunw wal bahru yamudduhoo mim ba'dihee sab'atu abhurim maa nafidat Kalimaatul laah; innal laaha 'azeezun Hakeem)
"और अगर ज़मीन में जितने दरख़्त हैं सब क़लम बन जाएं और समुंदर (सियाही बन जाए) और उसके बाद सात समुंदर और बढ़ा दिए जाएं [60], तब भी अल्लाह के कलिमात (तारीफ़ व इल्म) ख़त्म न होंगे [61]; बेशक अल्लाह ज़बरदस्त (ग़ालिब), बड़ी हिकमत वाला है।"
यह आयत मदीना मुनव्वरा के यहूदियों के एक एतिराज़ के जवाब में नाज़िल हुई। उन्होंने कहा कि क़ुरआन में एक जगह फ़रमाया गया कि इंसान को बहुत थोड़ा इल्म दिया गया, और दूसरी जगह फ़रमाया कि जिसे हिकमत मिली उसे बड़ी भलाई मिली। उनका यह भी दावा था कि तौरात में हर चीज़ का इल्म मौजूद है, लिहाज़ा यह तज़ाद है।
इसके जवाब में हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने वाज़ेह फ़रमाया कि अल्लाह के इल्म के मुक़ाबले में तमाम मख़लूक़ात का इल्म—तौरात, क़ुरआन और इंसानी उलूम—इंतिहाई महदूद है। अपनी वुसअत के बावजूद यह सब अल्लाह के ला-महदूद इल्म के सामने एक क़तरे की मानिंद है।
इस हक़ीक़त को समझाने के लिए अल्लाह ने फ़रमाया कि अगर ज़मीन के तमाम दरख़्त क़लम बन जाएं, और तमाम समुंदर—बल्कि उनके साथ सात समुंदर और—सियाही बन जाएं, और तमाम इंसान, जिन्नात और फ़रिश्ते लिखने लगें, तब भी अल्लाह के कलिमात और उसका इल्म ख़त्म नहीं हो सकता।
यह वाक़िआ हिजरत के बाद पेश आया, इसलिए यह आयत मदनी है।
इस आयत में दोनों चीज़ें शामिल हैं:
अल्लाह तआला की हम्द व सना, और
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की नात व मदह।
अगरचे ये अलफ़ाज़ इंसानी ज़बानों से अदा होते हैं, लेकिन इनका तअल्लुक़ अल्लाह की अज़मत और रहमत से है। हक़ीक़त में जो अलफ़ाज़ अल्लाह की बारगाह में मक़बूल हो जाते हैं वे उसी के कलिमात शुमार होते हैं, ख़्वाह उन्हें कोई भी अदा करे।
यह इलाही इल्म और कलाम की बे-इंतिहा वुसअत को ज़ाहिर करता है, और यह साबित करता है कि इंसानी अक़्ल कभी भी अल्लाह की हिकमत और क़ुदरत को पूरी तरह नहीं घेर सकती।
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