Transliteration: (Alam taraw annal laaha sakhkhara lakum maa fis sa maawaati wa maa fil ardi wa asbagha 'alaikum ni'amahoo zaahiratanw wa baatinah; wa minan naasi many yujaadilu fil laahi bighayri 'ilminw wa laa hudanw wa laa Kitaabim muneer)
"क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने तुम्हारे लिए काम में लगा दिया जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, और तुम पर अपनी खुली और छुपी नेमतें पूरी कर दीं [45]? और लोगों में से कोई ऐसा भी है जो अल्लाह के बारे में बग़ैर किसी इल्म, बग़ैर किसी हिदायत और बग़ैर किसी रौशन किताब के झगड़ता है [46]।"
यह आयत आसमानों और ज़मीन में अल्लाह की बे-शुमार नेअमतों की तरफ़ मुतवज्जोह करती है। हर चीज़ को इंसानी नफ़ा के लिए मुसख़्ख़र (काम में लगा) कर दिया गया है—सूरज, चाँद, बारिश, हवा, जानवर, फ़सलें, यहाँ तक कि वक़्त और मौसम। ये सब उसकी ज़ाहिरी नेअमतों का हिस्सा हैं।
साथ ही, आयत छुपी हुई (बातिनी) नेअमतों का भी ज़िक्र फ़रमाती है, जिसे उलेमा-ए-किराम ने मुख़्तलिफ़ ख़ूबसूरत तरीक़ों से बयान किया है:
ज़ाहिरी नेअमत: जिस्मानी हुस्न, सेहत, अक़्ल, दौलत, इस्लाम और क़ुरआन-ए-पाक।
बातिनी नेअमत: नेक अख़लाक़, पुख़्ता अक़ीदा, गहरा ईमान, रूहानी बसीरत, नबी-ए-करीम ﷺ की मुहब्बत, मारिफ़त-ए-इलाही और इख़्लास।
बाज़ उलेमा ने फ़रमाया:
शरीअत को ज़ाहिरी नेअमत, और
तरीक़त (रूहानी राह) को बातिनी नेअमत कहा गया है।
शरीअत उलेमा-ए-किराम के ज़रिए ज़ाहिरी आमाल और मुआशरे के निज़ाम की हिफ़ाज़त करती है, जबकि तरीक़त औलिया-ए-किराम और मुर्शिदीन की सोहबत से दिलों को पाकीज़ा बनाती है।
हुज़ूर ﷺ की ज़िंदगी और सुन्नत इसका ज़ाहिरी ढाँचा हैं, और आपकी बातिनी कैफ़ियात वह असल जौहर हैं जो तरीक़त के ज़रिए हासिल होते हैं।
पस, ज़ाहिरी और बातिनी दोनों नेअमतें लाज़िम व मलज़ूम हैं, जो इलाही करम का कामिल इज़हार हैं।
यह हिस्सा उन लोगों की तरफ़ इशारा करता है—जैसे नज़र बिन हारिस और उमय्या बिन ख़लफ़—जो अल्लाह के बारे में बग़ैर इल्म, बग़ैर हिकमत, और बग़ैर किसी आसमानी किताब के तकब्बुर के साथ झगड़ा करते थे। उनकी बहसें किसी सच्ची जुस्तजू पर मब्नी नहीं थीं, बल्कि हठधर्मी और गुमराही का नतीजा थीं।
यह आयत इलाही मुआम्लात में जाहिलों से उलझने से मना फ़रमाती है। अगर किसी शख़्स में सही समझ न हो, तो उससे बहस करना सिर्फ़ उलझन पैदा करता है, हिदायत नहीं।
यह एक अज़ीम उसूल सिखाता है:
जाहिलों से एहतराम से सवाल करो, लेकिन उनसे झगड़ा न करो। पुख़्ता इल्म के बग़ैर अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात में बहसबाज़ी करना काफ़िरों का तरीक़ा है, मोमिनीन का नहीं।
ख़ुलासा यह कि यह आयत हमें याद दिलाती है:
हर क़िस्म की नेअमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करें,
दीन के ज़ाहिरी और बातिनी दोनों पहलुओं का एहतराम करें,
और ईमान के मुआम्लात में तकब्बुर भरी बहसों से परहेज़ करें।
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