Transliteration: (Ulaaa'ika 'alaa hudam mir Rabbihim wa ulaaa'ika humul muflihoon)
"यही लोग अपने रब की तरफ़ से हिदायत पर हैं, और यही लोग फ़लाह (कामयाबी) पाने वाले हैं [6]।"
यह आयत तस्दीक़ करती है कि सच्चे मोमिन—जो ईमान के साथ नेक आमाल को जमा करते हैं—वही लोग इलाही हिदायत पर क़ायम हैं, और सिर्फ़ वही दुनिया और आख़िरत में हक़ीक़ी कामयाबी हासिल करेंगे।
इससे दो अहम नुक़ात सामने आते हैं:
कामयाबी नेक आमाल से जुदा नहीं हो सकती। कोई भी शख़्स ख़ालिस कोशिश के बग़ैर आख़िरत के सवाब की उम्मीद नहीं रख सकता। अमल के बग़ैर महज़ कामयाबी की तमन्ना करना ऐसा ही है जैसे जौ बोकर गेहूँ काटने की उम्मीद रखना—जो महज़ एक फ़रेब है। नेक आमाल ही नजात की बुनियाद हैं।
हिदायत महज़ अल्लाह के फ़ज़्ल व करम से मिलती है। सिर्फ़ इंसानी अक़्ल या किताबी इल्म इसकी ज़मानत नहीं दे सकता। अक्सर देखा जाता है कि आला दर्जे के पढ़े-लिखे लोग कुफ़्र में मुब्तला हो जाते हैं, जबकि सीधे-सादे अनपढ़ लोग सच्चे ईमान की दौलत पा लेते हैं। यह साबित करता है कि इलाही फ़ज़्ल—न कि दुनियावी सनदें—हिदायत और बसीरत की असली चाबी है।
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