कुरान - 31:4 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ يُوقِنُونَ

Transliteration: (Allazeena yuqeemoonas Salaata wa yu'toonaz Zakaata wa hum bil Aakhirati hum yooqinoon)

जो नमाज़ क़ायम करते हैं [4] और ज़कात अदा करते हैं, और वे आख़िरत पर कामिल यक़ीन रखते हैं [5]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 4

"जो नमाज़ क़ायम करते हैं [4] और ज़कात अदा करते हैं, और वे आख़िरत पर कामिल यक़ीन रखते हैं [5]।"

[4] क़ुरआनी हिदायत से फ़ायदा उठाने वाले

यह आयत बयान करती है कि सिर्फ़ वही शख़्स जो ईमान और तक़वा दोनों रखता हो क़ुरआन-ए-मजीद से पूरा-पूरा फ़ायदा हासिल कर सकता है। यह महज़ तिलावत करने का नाम नहीं है, बल्कि ईमान, अमल और एहतराम का संगम है जो क़ुरआन की गहरी हिकमतों के दरवाज़े खोलता है।

यह भी वाज़ेह किया गया है कि क़ुरआन-ए-पाक हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की ज़ात के लिए रहनुमा बनकर नाज़िल नहीं हुआ, क्योंकि आप तो नुज़ूल-ए-क़ुरआन से पहले ही कामिल हिदायत पर थे। नबुव्वत के ऐलान से पहले भी हुज़ूर ﷺ ईमान का आला तरीन नमूना, तक़वे में कामिल, और इलाही इबादत में डूबे हुए थे। जब क़ुरआन की पहली आयत नाज़िल हुई, आप पहले ही से नमाज़ और ग़ार-ए-हिरा में एतिकाफ़ में मशग़ूल थे, जो आपकी इबादत से कामिल आश्नाई और अज़ीम रूहानी इल्म का सबूत है।

[5] इस आयत से हासिल होने वाले नुक़ात

  1. नमाज़ ज़कात से अफ़ज़ल है, क्योंकि इस आयत में इसे ज़कात से पहले ज़िक्र किया गया है। यह तरतीब इस्लामी आमाल में नमाज़ के आला मर्तबे और बुनियादी किरदार को ज़ाहिर करती है।

  2. नमाज़ और ज़कात की सेहत ईमान पर मौक़ूफ़ है। हर्फ़-ए-अतफ़ "वा" (और) की मौजूदगी से यह समझा जाता है कि ये आमाल सिर्फ़ हालत-ए-ईमान में ही अल्लाह के यहाँ क़बूल होते हैं।

  3. अगरचे ज़कात मदीना मुनव्वरा में फ़र्ज़ की गई, लेकिन इस मक्की आयत में इसका पहले ही ज़िक्र फ़रमाया गया। इससे मालूम होता है कि अल्लाह तआला ने पहले से इब्तिदाई इल्म और हिदायत अता फ़रमा दी थी, ताकि मोमिनीन को तैयार किया जा सके और जब हुक्म नाज़िल हो तो वे रूहानी तौर पर उस फ़रीज़े को अदा करने के लिए मुकम्मल तैयार हों।

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