कुरान - 31:2 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
تِلۡكَ ءَايَٰتُ ٱلۡكِتَٰبِ ٱلۡحَكِيمِ

Transliteration: (Tilka Aayaatul Kitaabil Hakeem)

ये हिकमत से भरपूर किताब की आयात हैं [2]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 2

"ये हिकमत से भरपूर किताब की आयात हैं [2];" (कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा)

[2] उनवान: हिकमत वाली किताब

क़ुरआन-ए-मजीद को यहाँ “किताब” और “हिकमत वाली किताब” दोनों फ़रमाया गया है, जो न सिर्फ़ इसके मुक़द्दस आसमानी कलाम होने को ज़ाहिर करता है बल्कि इसकी बे-पनाह गहराई और बे-ऐब हिदायत को भी उजागर करता है।

इस आयत से हम यह समझते हैं कि अल्लाह तआला के सिफ़ाती नाम मफ़हूम के एतबार से दूसरों के लिए भी मुश्तरक हो सकते हैं, अगरचे ज़ात और दर्जे में कोई बराबरी नहीं हो सकती। मिसाल के तौर पर, "हकीम" (बड़ी हिकमत वाला) अल्लाह तआला का एक मुबारक नाम है, जो उसकी ला-महदूद हिकमत को ज़ाहिर करता है, और फिर भी क़ुरआन-ए-पाक को भी हकीम फ़रमाया गया है, क्योंकि यह हिदायत, क़वानीन और हक़ाइक़ में इलाही हिकमत का मुजस्समा है।

यह इस बात की वज़ाहत करता है कि अगरचे अलफ़ाज़ ज़बान में साझे हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ़ अल्लाह तआला ही मुतलक़ और कामिल तौर पर उस सिफ़त का मालिक है—जबकि मख़लूक़ात में ये सिफ़ात महदूद और अल्लाह की अता कर्दा हैसियत से पाई जाती हैं।

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