Transliteration: (Wa minan naasi mai-yashtaree lahwal haddesi li yudilla 'an sabeelil laahi bighairi 'ilminw wa yattakhizahaa huzuwaa; ulaaa'ika lahum 'azaabum muheen)
"और लोगों में से कोई ऐसा भी है जो लह्वुल हदीस (फ़ुज़ूल व बहकाने वाली बातें) ख़रीदता है [7] ताकि बग़ैर किसी इल्म के (दूसरों को) अल्लाह की राह से भटकाए [8] और उसका मज़ाक़ उड़ाए; ऐसे लोगों के लिए रुसवाकुन अज़ाब है [9]।"
आयत का यह हिस्सा गाने-बाजे के आलात (म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट्स), ताश के खेल, शराब, और हर उस फ़ुज़ूल तफ़रीह को हराम ठहराता है जो ज़िक्र-ए-इलाही से ग़ाफ़िल कर दे। यह उन चीज़ों की ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त की भी मज़म्मत करता है जो ऐसी बेहूदगियों में इस्तेमाल होती हैं, जैसे फ़हश रिसाले, सिनेमा के टिकट, नाटक-तमाशों के लिबास और बेहूदा नावल।
यह आयत नज़र बिन हारिस बिन कलदा के बारे में नाज़िल हुई, जो तिजारत के लिए बाहर के मुल्कों में जाता था और वापसी पर अजमी दास्तानों और क़िस्सों की किताबें ख़रीद कर लाता था। वह इन क़िस्सों के ज़रिए क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहता था: “मुहम्मद तुम्हें आद और समूद के क़िस्से सुनाते हैं; आओ मैं तुम्हें रुस्तम, इसफ़ंदियार और ईरान के बादशाहों के क़िस्से सुनाता हूँ।” उसका मक़सद लोगों को बेहूदा दुनियावी दास्तानों के ज़रिए वही-ए-इलाही से भटकाना था।
तफ़रीह की यह शक्ल कोई मामूली बात नहीं थी—बल्कि यह हिदायत की बुनियादें हिलाने और तफ़रीह के नाम पर रूहानी ग़फ़लत फैलाने की साज़िश थी।
सूफ़िया-ए-किराम के नज़दीक हर वह चीज़ जो इंसान को अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल कर दे, “लह्वुल हदीस” में दाख़िल और मम्नूअ है। यहाँ तक कि जुमुआ की अज़ान के बाद दुनियावी काम, जैसे ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त में लगे रहना, भी इस हुक्म में आ जाता है अगर वह नमाज़ की तैयारी में रुकावट बने।
यहाँ तक कि अगर औलाद भी अल्लाह की याद में रुकावट बन जाए, तो ऐसी मसरूफ़ियत भी लह्व व लइब का हिस्सा समझी जाती है।
तफ़सीर रूहुल बयान में वज़ाहत है कि साज़ और आलात-ए-मौसीक़ी नीयत के एतबार से हराम या जायज़ हो सकते हैं। अगर मक़सद महज़ नफ़्सानी तफ़रीह हो, तो वह हराम है। लेकिन अगर मक़सद नेक हो—जैसे इस्लामी मुजाहिदीन का जंग में नक़्क़ारा बजाना—तो जायज़ है। इसी तरह क़व्वाली, अगर महज़ तफ़रीह और लज़्ज़त के तौर पर गाई जाए, तो नाजायज़ हो जाती है, जैसा कि आज-कल के आम दस्तूर में देखा जाता है।
आयत का आख़िरी हिस्सा उन लोगों के लिए रुसवाकुन अज़ाब की चेतावनी देता है जो दूसरों को सीधे रास्ते से भटकाते हैं। हर गुमराह होने वाले का गुनाह भी उनके बोझ में इज़ाफ़ा करता है। यहाँ दोबारा नज़र बिन हारिस की मिसाल दी गई है—वह इलाही ग़ज़ब का शिकार हुआ और आख़िरकार ज़लील व रुसवा हुआ।
यह बात असर-ओ-रुसूख़ की भारी ज़िम्मेदारी को उजागर करती है—दूसरों को भटकाना, ख़ास तौर पर दीन के मामले में, अल्लाह की बारगाह में सबसे संगीन जुर्मों में से एक है।
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