Transliteration: (Wa izaa tutlaa 'alayhi Aayaatunaa wallaa mustakbiran ka al lam yasma'haa ka anna feee uzunaihi waqran fabash shiru bi'azaabin aleem)
"और जब उसके सामने हमारी आयात पढ़ी जाती हैं, तो वह तकब्बुर करते हुए इस तरह मुंह फेर लेता है गोया उसने उन्हें सुना ही नहीं, जैसे उसके कानों में डाट (भारीपन) हो [10]; पस आप उसे दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दीजिए।"
यह आयत काफ़िरों के उस तकब्बुर भरे रवैये को बयान करती है जब उनके सामने क़ुरआन की आयात पढ़ी जाती हैं। वे आजिज़ी से सुनने या ग़ौर करने के बजाए घमंड के साथ मुंह फेर लेते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं, गोया उनके कानों में डाट (भारीपन) लगी हो—जो उनके इरादतन बहरेपन का इस्तिआरा है।
यह रवैया सिर्फ़ कुफ़्र नहीं, बल्कि इलाही हिदायत के लिए हिक़ारत और बे-रुख़ी है, जिसकी वजह से उन्हें दर्दनाक अज़ाब की वईद सुनाई गई।
इससे यह समझा जाता है कि क़ुरआन-ए-पाक की हर तिलावत को अदब और शौक़ के साथ सुनना चाहिए। तिलावत के दौरान दुनियावी बातों में मशग़ूल रहना बे-रुख़ी को ज़ाहिर करता है, जो काफ़िरों की ख़स्लत है।
यह जानना ज़रूरी है कि क़ुरआन को तवज्जोह से सुनना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है। अगर किसी मजलिस में कुछ लोग भी इसे ध्यान से सुन लें तो बाक़ी गुनाहगार नहीं होते; लेकिन अगर कोई भी तवज्जोह से न सुने, तो पूरी जमाअत गुनाह में शरीक होती है।
जहाँ लोग पूरी तवज्जोह न दे सकें, जैसे भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों में या काम-काज के वक़्त, वहाँ क़ुरआन को बुलंद आवाज़ से नहीं पढ़ना चाहिए। यह कलाम-ए-इलाही के तक़द्दुस का तक़ाज़ा है। साथ ही, क़ुरआन की तिलावत के अहकाम और तालीम व तदरीस के अहकाम में फ़र्क़ करना लाज़िम है—हर एक का अपना मुनासिब मक़ाम और अदब है।
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