कुरान - 31:3 सूरह लुक़मान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
هُدٗى وَرَحۡمَةٗ لِّلۡمُحۡسِنِينَ

Transliteration: (Hudanw wa rahmatal lilmuhsineen)

हिदायत और रहमत है नेकोकारों (मुहसिनीन) के लिए [3]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह लुक़मान आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह लुक़मान तफ़सीर - आयत 3

"हिदायत और रहमत है नेकोकारों (मुहसिनीन) के लिए [3];" (कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा)

[3] नेकोकारों के लिए हिदायत और रहमत

यह आयत यह साबित करती है कि क़ुरआन-ए-पाक दोहरी हैसियत रखता है—नेक आमाल के लिए एक रहनुमा और उन लोगों के लिए रहमत का ज़रिया जो इस पर अमल करते हैं। ईमान वालों के लिए यह रोज़मर्रा ज़िंदगी में नेक काम करने की हिदायत देता है; और मुत्तक़ियों के लिए यह जन्नत का रास्ता है, जो वाज़ेह अहकाम और जज़ा की बशारत के साथ उनकी रहनुमाई करता है।

इससे उलेमा-ए-किराम यह नतीजा निकालते हैं कि काफ़िरों पर इबादत के अहकाम फ़र्ज़ नहीं हैं। इबादत के फ़राएज़—जैसे नमाज़, रोज़ा और ज़कात—ख़ास तौर पर ईमान वालों के लिए नाज़िल हुए, जो इलाही शरीअत को तस्लीम करते और उसके आगे झुकते हैं। काफ़िरों से पहले ईमान लाने का मुतालबा है, जिसके बाद ही इबादत के अहकाम लाज़िम होते हैं। यह फ़र्क़ यह समझाता है कि इलाही क़ानून ईमान और इक़रार के मुताबिक़ ज़िम्मेदारियाँ तय करता है।

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