Transliteration: (Qaala laqad zalamaka bisu 'aali na'jatika ilaa ni'aajih; wa inna kaseeran minal khulataaa'i la-yabghee ba'duhum 'alaa ba'din illal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati wa qaleelun maa hum; wa zanna Daawoodu annamaa fatannaahu fastaghfara Rabbahoo wa kharra raaki'anw wa anaab (make sajdah))
"(दाऊद ने) फ़रमाया: यक़ीनन इसने तुम्हारी दुम्बी को अपनी दुम्बियों में मिलाने का मुतालबा करके तुम पर ज़ुल्म किया, और बेशक अक्सर शरीकदार एक दूसरे पर ज़्यादती करते हैं [45], सिवाए उन लोगों के जो ईमान लाए और नेक आमाल किए और ऐसे लोग बहुत कम हैं [46], और दाऊद समझ गए कि हमने उन्हें आज़माया है [47], पस उन्होंने अपने रब से बख़्शिश तलब की और रुकूअ (सजदे) में गिर पड़े [48] और तौबा की। (सजदा)"
साझेदारी और तअल्लुक़ात में अक्सर लोग अपने साथी पर ज़्यादती या दबाव डालते हैं जो इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है।
हज़रत दाऊद ने मुद्दई की बात सुनकर राय क़ायम फ़रमाई। फ़तवे में ऐसा मुम्किन है मगर मुक़द्दमे के क़तई फ़ैसले में दोनों फ़रीक़ को सुनना लाज़िम है।
हज़रत दाऊद फ़ौरन समझ गए कि यह अल्लाह तआला की तरफ़ से इम्तिहान और तंबीह थी। अंबिया-ए-किराम की ज़रा सी लग़्ज़िश भी अज़ीम आज़माइश बन जाती है।
हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) फ़ौरन बारगाहे इलाही में सजदे में गिर पड़े और तौबा व मग़फ़िरत तलब की। यहाँ सजदा-ए-तिलावत वाजिब है, क्योंकि आपकी तौबा क़बूल हुई और शुक्राने में सजदा किया गया।
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