Transliteration: (Iz dakhaloo 'alaa Daawooda fafazi'a minhum qaaloo laa takhaf khasmaani baghaa ba'dunaa 'alaa ba'din fahkum bainanaaa bilhaqqi wa laa tushtit wahdinaaa ilaa Sawaaa'is Siraat)
"जब वे दाऊद के पास आए तो वे उनसे चौंक गए [39], उन्होंने कहा: डरिए मत [40]! हम दो फ़रीक़ हैं, हममें से एक ने दूसरे पर ज़्यादती की है [41], पस आप हमारे दरमियान हक़ के साथ फ़ैसला कीजिए और नाइंसाफ़ी न कीजिए [42] और हमें सीधे रास्ते की रहनुमाई फ़रमाइए।"
दरवाज़ा बंद होने के बावजूद अचानक अजनबियों को देखकर हज़रत दाऊद मुतफ़क्किर हुए। सूफ़ी-ए-किराम फ़रमाते हैं कि यह ख़ौफ़ किसी जान का नहीं बल्कि अल्लाह की बारगाह का ख़ौफ़ था कि कोई ग़ैबी अम्र दरपेश है।
फ़रिश्तों ने अर्ज़ किया कि "ख़ौफ़ न कीजिए", क्योंकि अंबिया महफ़ूज़ होते हैं और उनकी पनाह में मख़्लूक़ को अमन मिलता है।
यह एक फ़र्ज़ी सूरत-ए-हाल थी ताकि हज़रत दाऊद को एक नाज़ुक शरई अम्र की तरफ़ मुतवज्जेह किया जाए। फ़िक़्ह में ऐसी मिसालें (जैसे ज़ैद व अम्र) बयान करना जाइज़ है।
उनका यह कहना कि "बेइंसाफ़ी न कीजिए" क़ाज़ी को अदल की याद दिलाना है जो शरअन जाइज़ और बा-अदब दरख़्वास्त है।
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