कुरान - 38:28 सूरह साद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
أَمۡ نَجۡعَلُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ كَٱلۡمُفۡسِدِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِ أَمۡ نَجۡعَلُ ٱلۡمُتَّقِينَ كَٱلۡفُجَّارِ

Transliteration: (Am naj'alul lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati kalmufisdeena fil ardi am naj'alul muttaqeena kalfujjaar)

क्या हम उन लोगों को जो ईमान लाए [59] और नेक काम किए, उन जैसा कर दें जो ज़मीन में फ़साद मचाते हैं [60], या हम परहेज़गारों को बदकारों जैसा कर दें [61]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह साद आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह साद तफ़सीर - आयत 28

"क्या हम उन लोगों को जो ईमान लाए [59] और नेक काम किए, उन जैसा कर दें जो ज़मीन में फ़साद मचाते हैं [60], या हम परहेज़गारों को बदकारों जैसा कर दें [61]?"

[59] मुशरिकीन के दावे का रद्द

काफ़िर कहते थे कि अगर क़ियामत आई भी तो हमें मोमिनीन के बराबर दर्जा मिलेगा। अल्लाह ने उनके इस बातिल दावे को मुस्तरद फ़रमाया।

[60] अदलो-इंसाफ़ का तक़ाज़ा

इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि नेक और बदकार कभी बराबर नहीं हो सकते। दुनिया का कोई बादशाह भी मुजाहिदीन और मुजरिमों को एक जैसा नहीं रखता।

[61] अंबिया और सालेहीन के दरजात

जब आम मोमिन और काफ़िर बराबर नहीं, तो अंबिया-ए-किराम, सहाबा और औलिया-ए-इज़ाम का मर्तबा तो आम इंसानों से कहीं बुलंद व बाला है।

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