Transliteration: (Ya'maloona lahoo ma yashaaa'u mim mahaareeba wa tamaaseela wa jifaanin kaljawaabi wa qudoorir raasiyaat; i'maloo aala Daawooda shukraa; wa qaleelum min 'ibaadiyash shakoor)
"वे उसके लिए बनाते थे जो कुछ वह चाहते—बुलंद महलात [40], और मुजस्समे [41], और हौज़ों जैसे बड़े लगन [42], और जमी रहने वाली भारी देगें [43]। ऐ आले दाऊद! शुक्र के तौर पर अमल करो [44]। और मेरे बंदों में शुक्रगुज़ार बहुत कम हैं [45]।"
जिन्नात हज़रत सुलैमान के हुक्म से बुलंदो बाला इमारतें, मज़बूत क़िले और मस्जिदें तामीर करते थे, जिनमें सबसे मशहूर बैतुल मुक़द्दस (मस्जिदे अक़्सा) की तामीर है। इसके अलावा शाम और यमन के इलाक़ों में ऐसे अज़ीम महलात बनाए गए जो उस दौर की तरक़्क़ी का शाहकार थे।
जिन्नात हज़रत सुलैमान के लिए कांच, तांबे और संगमरमर की मूरतें (परिंदों, फ़रिश्तों और अंबिया की शबीहें) बनाते थे। याद रहे कि हज़रत सुलैमान की शरीअत में ऐसी गैर-माबूद तस्वीरें और मुजस्समे हराम नहीं थे, जबकि हमारी शरीअते मुहम्मदिया ﷺ में शिर्क के सद्दे बाब के लिए जानदार की तस्वीर व मुजस्समा हराम क़रार दिया गया।
जिन्नात ऐसे अज़ीम लगन और थाल बनाते थे जो पानी के बड़े हौज़ों के बराबर होते थे, जिनमें से एक-एक बर्तन पर हज़ारों अफ़राद एक साथ बैठकर खाना खाते थे। यह हज़रत सुलैमान की बे-मिसाल सख़ावत और मेहमान-नवाज़ी का ज़रिया था।
वे ऐसी भारी और वज़नी देगें बनाते थे जो पहाड़ों पर अपनी जगह जमी रहती थीं और उन्हें सीढ़ियाँ लगाकर चढ़ना पड़ता था। इनमें लश्करियों और आम ग़रीबों के लिए हर वक़्त हज़ारों मन खाना पकता रहता था।
अल्लाह ने हुक्म दिया: “ऐ आले दाऊद! शुक्र के तौर पर अमल करो।” इससे हज़रत सुलैमान, उनके अहल व अयाल और मुआशरा मुराद हैं। शुक्र केवल ज़बानी नहीं बल्कि इताअत और आमाले सालेहा से अदा होता है। इससे दो बुनियादी अस्बाक़ मिलते हैं:
शुक्रगुज़ारी एक अज़ीम इबादत है, जिस पर पिछले तमाम अंबिया कारबंद रहे।
जिस पर अल्लाह की जितनी ज़्यादा नेमतें हों, उस पर उतना ही बड़ा शुक्र वाजिब हो जाता है—जिस तरह माल की ज़्यादती पर ज़कात लाज़िम होती है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हक़ीक़ी शुक्रगुज़ार बंदे बहुत कम हैं। नेमतों का सही इस्तेमाल करना और हर हाल में अल्लाह का शुक्र बजा लाना बहुत अज़ीम सिफ़त है जो सिर्फ़ ख़ास और बरगुज़ीदा बंदों को नसीब होती है।
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