कुरान - 34:1 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ ٱلَّذِي لَهُۥ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَهُ ٱلۡحَمۡدُ فِي ٱلۡأٓخِرَةِۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡخَبِيرُ

Transliteration: (Alhamdu lillaahil lazee lahoo maa fis samaawaati wa maa fil ardi wa lahul hamdu fil aakhirah; wa Huwal Hakeemul Khabeer)

तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं [1] जिसका है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है [2], और उसी के लिए हम्द है आख़िरत में भी [3]; और वही बड़ी हिकमत वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है [4]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 1

"तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं [1] जिसका है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है [2], और उसी के लिए हम्द है आख़िरत में भी [3]; और वही बड़ी हिकमत वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है [4]।"

[1] तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं

इसका मफ़हूम यह है कि तारीफ़ और कमाल की हर क़िस्म—ख्वाह वह बराहे रास्त हो या बिल-वास्ता—हक़ीक़त में अल्लाह ही के लिए ख़ास है। जब किसी नबी या वली की मद्दाही और तारीफ़ की जाती है, तो वह भी दर-हक़ीक़त अल्लाह ही की हम्द है, क्योंकि उनके तमाम फ़ज़ाइल, कमालात और बुज़ुर्गी को अता फ़रमाने वाली ज़ात वही एक परवरदिगार है। चुनांचे हर क़िस्म की सना और तारीफ़ का मरकज़ अल्लाह तआला की ज़ात ही है।

[2] हक़ीक़ी मिल्कियत अल्लाह ही की है

आसमानों और ज़मीन की हर एक शै अल्लाह ही की मख़लूक़ और उसी की मिल्कियत है। अगरचे दुनिया में इंसान ज़ाहिरी तौर पर कुछ चीज़ों का मालिक नज़र आता है, लेकिन उसकी यह मिल्कियत महदूद, आरज़ी और मजाज़ी है; जबकि अल्लाह तआला की मिल्कियत कामिल, दायमी और हक़ीक़ी है। लिहाज़ा दुनियावी मिल्कियत से इस आयत का कोई तज़ाद नहीं, क्योंकि हर शै का हक़ीक़ी मुतसर्रिफ़ और मालिक वही है।

[3] आख़िरत में हम्द और मक़ामे महमूद

इस मुबारक टुकड़े से दो गहरे और अहम हक़ायक़ वाज़ेह होते हैं:

  1. क़यामत के दिन किसी भी दुनियावी हस्ती की हम्द नहीं होगी—बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की हम्द व किबरियाई से तमाम आलम गूंज उठेगा।

  2. अल्लाह के महबूब बंदों, ख़ास तौर पर हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ की तारीफ़ भी दर-हक़ीक़त अल्लाह की हम्द का परताव है। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: "क़रीब है कि आपका रब आपको मक़ामे महमूद पर फ़ाइज़ फ़रमाए" (सूरह बनी इसराईल, 17:79), जहाँ अव्वलीन व आख़िरीन आपकी तारीफ़ करेंगे।

काफ़िरों की झूठी मद्ह सरतासर गुमराही है, जबकि अल्लाह के महबूबों की ताज़ीम व सना ईमान की जान है। मिसाल के तौर पर कलिमा तय्यिबा में हुज़ूर ﷺ का ज़िक्र ईमान का लाज़िमी जुज़ है, और नमाज़ में आप पर दुरूद व सलाम इबादत का अहम रुक्न है।

[4] हकीम और ख़बीर परवरदिगार

यह मुबारक ख़ातमा इस बात की ताकीद फ़रमाता है कि इख़्लास के साथ की गई कोई हम्द बे-जज़ा नहीं रहती। जब आप हक़ और भलाई का एतराफ़ करते हैं तो अल्लाह उसका बेहतरीन सवाब अता फ़रमाता है, क्योंकि वह अपनी नवाज़िशों में बड़ी हिकमत वाला (हकीम) है और हर बंदे की नियत व हक़ीक़त से पूरी तरह बा-ख़बर (ख़बीर) है।

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