Transliteration: (Wallazeena sa'aw feee aayaatinaa mu'aajizeena ulaaa 'ika lahum 'azaabum mir rijzin aleem)
"और जिन लोगों ने हमारी आयतों को आजिज़ करने की कोशिश की [16], उनके लिए दर्दनाक अज़ाब की सज़ा है [17]।"
इससे मुराद वे लोग हैं जिन्होंने क़ुरआने मजीद की तालीमात का दीदा व दानिस्ता मुक़ाबला किया और उसे जादू, शायरी या अपनी तरफ़ से गढ़ी हुई बात क़रार दिया। उनका मक़सद दीने हक़ की नश्रो इशाअत को रोकना और सादा-लौह लोगों को सीधे रास्ते से भटकाना था। उनकी यह मुख़ालफ़त किसी बे-ख़बरी की वजह से नहीं बल्कि हठधर्मी और तकब्बुर पर मबनी थी।
अल्लाह की आयतों के सिलसिले में इंसान दो तरह की कोशिशें करता है:
मुस्बत और नेक कोशिश: आयतों को समझना, तफ़सीर करना और उनसे शरई अहकाम व रूहानी हिदायत अक्ज़ करना—यह ऐन इबादत और सआदत है।
मनफ़ी और बातिल कोशिश: इस आयत में मज़कूर वह अमल जिसमें क़ुरआन को ग़लत साबित करने, तज़ाद तलाशने या आजिज़ करने की नापाक साज़िश की जाए—यह खुला कुफ़्र और सरकशी है।
यह आयत दूसरी क़िस्म के मुफ़्सिदों की पुरज़ोर मज़म्मत करती है जो हक़ को दबाने के लिए मुनाज़रा बाज़ी और दलीलों का ग़लत इस्तेमाल करते हैं। ऐसे हक़-फ़रामोशों के लिए आख़िरत में शदीद और दर्दनाक अज़ाब तय्यार है।
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