कुरान - 34:3 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لَا تَأۡتِينَا ٱلسَّاعَةُۖ قُلۡ بَلَىٰ وَرَبِّي لَتَأۡتِيَنَّكُمۡ عَٰلِمِ ٱلۡغَيۡبِۖ لَا يَعۡزُبُ عَنۡهُ مِثۡقَالُ ذَرَّةٖ فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَلَا فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَآ أَصۡغَرُ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكۡبَرُ إِلَّا فِي كِتَٰبٖ مُّبِينٖ

Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafaroo laa taateenas Saa'ah; qul balaa wa Rabbee lataatiyannakum 'Aalimul Ghaib; laa ya'zubu 'anhu misqaalu zarratin fis samaawaati wa laa fil ardi wa laaa asgharu min zaalika wa laaa akbaru illaa fee kitaabim mubeen)

और काफ़िरों ने कहा, "हम पर क़यामत नहीं आएगी [10];" आप फ़रमा दीजिए, "क्यों नहीं! मेरे रब की क़सम! वह ज़रूर तुम पर आएगी, जो ग़ैब का जानने वाला है [11]; उससे आसमानों और ज़मीन में एक ज़र्रा बराबर भी कोई चीज़ ओझल नहीं हो सकती [12], और न ज़र्रे से कोई छोटी चीज़ और न कोई बड़ी, मगर वह एक रौशन किताब (लौहे महफ़ूज़) में दर्ज है [13]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 3

"और काफ़िरों ने कहा: 'हम पर क़यामत नहीं आएगी [10]।' आप फ़रमा दीजिए: 'क्यों नहीं! मेरे रब की क़सम! वह ज़रूर तुम पर आएगी, जो ग़ैब का जानने वाला है [11]। उससे आसमानों में और ज़मीन में एक ज़र्रा बराबर भी कोई चीज़ ओझल नहीं हो सकती [12], और न ज़र्रे से कोई छोटी चीज़ और न कोई बड़ी, मगर वह एक रौशन किताब में दर्ज है [13]।'"

[10] क़यामत का इनकार और उसकी तरदीद

काफ़िर और मुशरिकीन मज़ाक़ और घमंड में कहते थे कि क़यामत का दिन (अल-साअत) कभी नहीं आएगा, ख़ास तौर पर उनकी ज़िंदगी में तो बिल्कुल नहीं। उनका ख़्याल था कि चूँकि वे मरकर मिट्टी हो जाएंगे, इसलिए वे इस हिसाब-किताब से बच निकलेंगे। यह आयत उनके इस बातिल ख़्याल की सख़्त तरदीद फ़रमाती है और क़यामत के वक़ूअ पज़ीर होने को यक़ीनी क़रार देती है।

[11] आलिमुल ग़ैब परवरदिगार की क़सम

अल्लाह तआला ने अपने प्यारे रसूल ﷺ को हुक्म दिया कि रब की क़सम खाकर ऐलान फ़रमाएं जो आलिमुल ग़ैब (ग़ैब का जानने वाला) है। यह इस बात को वाज़ेह करता है कि क़यामत का आना कोई कयास नहीं, बल्कि इलाही इल्म से साबित शुदा हक़ीक़त है। अल्लाह का इल्म तमाम पोशीदा राज़ों और मुस्तक़बिल के तमाम वाक़िआत पर मुहीत है, लिहाज़ा क़यामत का वादा अटल है।

[12] कायनात के एक-एक ज़र्रे का इल्म और बाअस

मुनकिरीन-ए-क़यामत को यह शुबहा था कि जब इंसान की हड्डियां और जिस्म गल-सड़ कर ख़ाक में मिल जाएंगे, तो उन्हें दोबारा कैसे जमा किया जाएगा? आयत ने जवाब दिया कि ज़मीन व आसमान का एक ज़र्रा भी अल्लाह के इल्म से छुपा हुआ नहीं है। लिहाज़ा बिखरे हुए अज्ज़ा को पहचानना और उन्हें दोबारा ज़िंदा करना उसकी क़ुदरत के लिए निहायत आसान है।

[13] लौहे महफ़ूज़ और औलिया व अंबिया पर उसका इज़हार

इस मुबारक फ़रमान से दो बुनियादी बातें साबित होती हैं:

  1. कायनात का हर छोटा-बड़ा वाक़िआ और हर मख़लूक़ का वजूद किताबे मुबीन यानी लौहे महफ़ूज़ में पहले से दर्ज और महफ़ूज़ है।

  2. यह किताबे मुबीन अल्लाह के बरगुज़ीदा बंदों (अंबिया व औलिया) से छुपी हुई नहीं है; अल्लाह तआला अपने इज़्न व अता से उन्हें इस पर मुत्तलअ फ़रमाता है, जो उनकी अज़ीम शान का इज़हार है।

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